महाराष्ट्र की पावन धरती संतों और वीरों की भूमि रही है। इस भूमि पर भक्ति की जो अविरल धारा बही, उसने न केवल जनमानस के दिलों को ईश्वर-प्रेम से भर दिया, बल्कि मुगलों और आदिलशाही के अत्याचारों के बीच हिंदू समाज को अपनी संस्कृति की रक्षा करने का आत्मबल भी दिया। इस भक्ति आंदोलन के सर्वोच्च शिखर और वारकरी संप्रदाय के प्राण थे — संत तुकाराम महाराज (Sant Tukaram), जिन्हें महाराष्ट्र के लोग बड़े आदर और प्रेम से ‘तुकोबाराय’ या ‘तुकोबा’ कहते हैं।
संत तुकाराम के बारे में वारकरी परंपरा में एक बहुत ही सुंदर और प्रसिद्ध पंक्ति कही जाती है:
“संत कृपा झाली, इमारत फळा आली।
ज्ञानदेवे रचिला पाया, तुका झालासे कळस॥”
(अर्थात: संतों की कृपा हुई और भक्ति की भव्य इमारत बनकर तैयार हुई। संत ज्ञानेश्वर ने जिस भक्ति मंदिर की नींव रखी थी, संत तुकाराम उस मंदिर का स्वर्णिम कलश बने!)
संत तुकाराम कोई महलों में रहने वाले संन्यासी नहीं थे। उन्होंने अपने जीवन में भीषण भुखमरी, अकाल, व्यापार में बर्बादी, पत्नी और पुत्र की भूख से तड़पकर मौत जैसे असहनीय दुखों का पहाड़ झेला। लेकिन इन भयानक आपदाओं के बीच भी उनके होठों से केवल एक ही नाम निकला — “विट्ठल… विट्ठल… जय हरी विट्ठल!”। अपने 4,500 से अधिक अभंगों के माध्यम से उन्होंने समाज के पाखंड, जातिवाद और अंधविश्वास पर ऐसी करारी चोट की कि बड़े-बड़े विद्वानों को उनके चरणों में झुकना पड़ा।
इस विस्तृत लेख में हम संत तुकाराम के जन्म, पारिवारिक त्रासदियों, इंद्रायणी नदी में कर्ज के कागजात डुबोने, स्वप्न में दीक्षा, नदी में अभंगों के 13 दिन डूबकर तैर आने के ऐतिहासिक चमत्कार, छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ प्रसंग, और सशरीर वैकुंठ गमन की अमर गाथा को बहुत ही सरल, आत्मीय और बोलचाल की हिंदी में जानेंगे।
जन्म और बाल्यकाल: देहू के पावन तट पर प्राकट्य
संत तुकाराम का जन्म 17वीं शताब्दी (लगभग 1598 या 1608 ईस्वी) में महाराष्ट्र के पुणे जिले में पवित्र इंद्रायणी नदी के तट पर बसे देहू (Dehu) नामक एक सुंदर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम बोल्होबा मोरे (अंबिले) और माता का नाम कनकाई था। वे मराठा (कुंभी) परिवार से संबंध रखते थे, जो गांव में साहूकारी, खेती और किराने का व्यापार करता था।
तुकाराम के पूर्वज विश्वंभर बुवा भगवान विट्ठल (पांडुरंग) के परम भक्त थे। परिवार में पीढ़ियों से आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी पर पंढरपुर की पैदल वारी (पदयात्रा) करने का नियम चला आ रहा था। बालक तुकाराम का बचपन बड़े लाड़-प्यार में बीता। उनका स्वभाव बचपन से ही बहुत शांत, दयालु और दूसरों की मदद करने वाला था।
भीषण अकाल (दुष्काल) और पारिवारिक त्रासदियां
जब तुकाराम लगभग 18-20 वर्ष के हुए, तो उनके माता-पिता का एक के बाद एक देहांत हो गया। बड़े भाई ने संसार छोड़कर संन्यास ले लिया। घर और व्यापार की पूरी जिम्मेदारी युवा तुकाराम के कंधों पर आ गई। उनका विवाह रखूमाबाई से हुआ था, जिनसे उनका एक बेटा था जिसका नाम संतोष था।
1629-30 का महा-दुष्काल: जिंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान
संवत 1686 (1630 ईस्वी) में पूरे दक्कन और महाराष्ट्र में एक ऐसा भीषण अकाल पड़ा जिसकी कल्पना करके आज भी रूह कांप जाती है। बारिश की एक बूंद नहीं गिरी। नदियां, कुएं और तालाब सूख गए। खेतों की फसलें जलकर राख हो गईं। खाने के लिए अनाज का एक दाना नहीं बचा। लोग पेड़ों की छाल और सूखी पत्तियां खाने लगे।
इस महा-अकाल में तुकाराम का किराने का व्यापार पूरी तरह बर्बाद हो गया। उनके घर में दाने-दाने की तंगी हो गई। सबसे बड़ा वज्रपात तब हुआ जब भूख और बीमारी के कारण तुकाराम की पहली पत्नी रखूमाबाई और उनका छोटा बेटा संतोष उनकी आंखों के सामने तड़प-तड़प कर परलोक सिधार गए! उनके मवेशी भूख-प्यास से मर गए।
इस असहनीय त्रासदी ने तुकाराम को अंदर तक झकझोर दिया। वे सोचने लगे कि जिस संसार में मनुष्य का जीवन पानी के बुलबुले जैसा नश्वर है, जहाँ एक रोटी के लिए इंसान कुत्ते की तरह लड़ रहा है, उस संसार की माया और धन-दौलत के पीछे भागना कितना व्यर्थ है!
इंद्रायणी नदी में कर्ज के कागजात डुबोना: त्याग का आदर्श
अकाल के समय तुकाराम के पास अपने पिता के जमाने के बहुत सारे कर्ज-पत्र (Promissory Notes) रखे थे, जिनमें गांव के गरीब किसानों ने अनाज और पैसे उधार ले रखे थे। यदि तुकाराम चाहते तो उन कागजातों के बल पर किसानों की बची-खुची जमीनें या घर हड़प सकते थे और अमीर बन सकते थे।
लेकिन तुकाराम के भीतर साक्षात करुणा बह रही थी। उन्होंने अपने छोटे भाई कान्होबा को बुलाया और कर्ज के सारे दस्तावेजों को दो बराबर हिस्सों में बांटा। उन्होंने छोटे भाई से कहा, “भाई! यह तुम्हारा आधा हिस्सा है, तुम जैसा चाहो वैसा करो।”
इसके बाद तुकाराम ने अपने हिस्से के सारे कर्ज-दस्तावेज उठाए और सीधे इंद्रायणी नदी के तट पर पहुंच गए। उन्होंने गांव के उन सभी गरीब और कर्जदार किसानों के सामने वे सारे कागजात इंद्रायणी के पानी में डुबोकर बहा दिए! उन्होंने हाथ जोड़कर किसानों से कहा, “आज से आप सभी मेरे कर्ज से पूरी तरह मुक्त हैं। भगवान पांडुरंग आप सबका भला करें।” किसानों की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली।
भामचंद्र और भंडारा पहाड़ियों पर कठोर तपस्या
सांसारिक मोह-माया को पीछे छोड़कर तुकाराम देहू के पास स्थित भंडारा पहाड़ी और भामचंद्र पहाड़ी की वीरान गुफाओं में चले गए। वहाँ वे दिन-रात एकांत में बैठकर भगवान विट्ठल के ध्यान और नाम-जप में लीन रहने लगे।
वे कड़ाके की ठंड, बरसात और चिलचिलाती धूप में बिना किसी छप्पर के पत्थरों पर बैठते थे। उनके शरीर पर जंगली पक्षी बैठ जाते थे और जहरीले बिच्छू-सांप उनके पास से निकल जाते थे, लेकिन तुकाराम की समाधि कभी भंग नहीं होती थी। 15-15 दिनों तक वे बिना अन्न-जल के समाधिस्थ रहते थे।
दूसरी पत्नी अवली (जिजाबाई) का समर्पण
तुकाराम का दूसरा विवाह अवली (जिजाबाई) से हुआ था। जिजाबाई एक समृद्ध साहूकार की बेटी थीं। वे स्वभाव से थोड़ी क्रोधी और खरी-खरी बोलने वाली थीं, लेकिन उनके भीतर अपने पति के लिए अगाध प्रेम था।
जब तुकाराम पहाड़ों पर समाधि में बैठ जाते, तो जिजाबाई नंगे पैर, कांटों भरी पगडंडियों पर चलकर उनके लिए सूखी ज्वार की रोटी और पानी का लोटा लेकर पहाड़ों पर पहुंचती थीं। कई बार उनके पैरों में गहरे कांटे चुभ जाते थे, लेकिन वे अपने पति को भूखा नहीं रहने देती थीं। तुकाराम अपनी पत्नी के इस त्याग का बहुत सम्मान करते थे और उसे भगवान की कृपा मानते थे।
स्वप्न में गुरु दीक्षा और अभंग रचना का आदेश
भंडारा पहाड़ी पर कई वर्षों की गहन साधना के बाद एक दिन तुकाराम को स्वप्न में एक अत्यंत तेजस्वी सिद्ध संत के दर्शन हुए। वे संत थे — स्वामी बाबाजी चैतन्य (जो राघव चैतन्य और केशव चैतन्य की महान गुरु-परंपरा से थे)।
गुरु बाबाजी चैतन्य ने तुकाराम के सिर पर अपना वरदहस्त रखा और उन्हें तारक महामंत्र दिया:
“राम कृष्ण हरी” (Rama Krishna Hari)
इसके कुछ ही समय बाद एक और अलौकिक घटना घटी। 13वीं सदी के महान वारकरी संत संत नामदेव जी ने भगवान विट्ठल के साथ तुकाराम के स्वप्न में दर्शन दिए। संत नामदेव ने कहा, “तुकोबा! मैंने अपने जीवनकाल में सौ करोड़ (शत-कोटि) अभंग रचने का संकल्प लिया था, लेकिन कुछ अभंग शेष रह गए थे। अब यह दायित्व तुम्हारा है। तुम उन बचे हुए अभंगों को पूरा करो और जन-जन में हरि-नाम का रस बांटो।”
इस स्वप्न के बाद तुकाराम के भीतर ज्ञान और कविता का ऐसा दिव्य सोता फूटा कि वे जो कुछ भी बोलते, वह सीधे ‘अभंग’ बन जाता था।
तुकाराम के अभंग और सामाजिक क्रांति: ‘तुकाराम गाथा’
संत तुकाराम ने मराठी भाषा में लगभग 4,500 से अधिक अभंगों की रचना की, जिनका संकलन आज ‘तुकाराम गाथा’ (Tukaram Gatha) के नाम से पूरे विश्व में प्रसिद्ध है।
उस दौर में धर्म और ज्ञान केवल संस्कृत भाषा और उच्च कुलीन पंडितों तक सीमित था। शूद्रों और महिलाओं को वेद या गीता सुनने तक का अधिकार नहीं था। तुकाराम ने इस अन्याय के खिलाफ अपनी कलम उठाई। उन्होंने वेदों और उपनिषदों के सबसे गूढ़ रहस्यों को आम किसान, मजदूर, बुनकर और महिलाओं की सरल लोकभाषा (मराठी) में ढाल दिया।
सच्चे साधु की पहचान
तुकाराम का यह अभंग आज भी महाराष्ट्र का राष्ट्रगान जैसा माना जाता है:
“जे का रंजले गांजले, त्यांसी म्हणे जो आपुले।
तोचि साधु ओळखावा, देव तेथेंचि जाणावा॥”
(जो व्यक्ति पीड़ित, दुखी, असहाय और दलितों को अपना समझकर गले लगाता है, उसी को सच्चा साधु समझो; और जान लो कि साक्षात परमात्मा वहीं निवास करते हैं!)
वे कहते थे कि जो साधु केवल भगवा कपड़े पहनकर लोगों को ठगते हैं या पत्थरों को पूजते हैं लेकिन इंसानों से नफरत करते हैं, वे ढोंगी हैं। सच्ची पूजा तो दुखी इंसान की सेवा और शुद्ध मन से विट्ठल का नाम जपना है।
इंद्रायणी नदी का ऐतिहासिक चमत्कार: १३ दिन बाद सूखी तैर आईं बहियां
तुकाराम की बढ़ती लोकप्रियता और उनके क्रांतिकारी विचारों से देहू के रूढ़िवादी पंडित, विशेषकर मंबाजी बोवा और रामेश्वर भट्ट अत्यंत ईर्ष्या करने लगे। उन्होंने धर्मसभा बुलाई और तुकाराम पर आरोप लगाया:
“तुम एक शूद्र (कुनबी) होकर वेदों का अर्थ मराठी में कैसे लिख सकते हो? तुम्हें धर्म पर बोलने और कविता लिखने का कोई अधिकार नहीं है। अपनी इन सारी बहियों को तुरंत नष्ट करो!”
धर्मसभा के आदेश से तुकाराम की अभंगों से भरी सभी हस्तलिखित पांडुलिपियों (बहियों) को भारी पत्थरों से बांधा गया और इंद्रायणी नदी के अथाह और गहरे जल में डुबो दिया गया!
१३ दिनों का अन्न-जल त्याग और विट्ठल की परीक्षा
अपनी जिंदगी भर की साधना और ईश्वर के पदों को पानी में डूबते देखकर तुकाराम का हृदय टूट गया। वे नदी के किनारे एक पाषाण शिला पर बैठ गए। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि यदि उनके अभंग झूठे हैं, तो वे यहीं अपने प्राण त्याग देंगे; और यदि उनके अभंग सच्चे हैं, तो भगवान विट्ठल को स्वयं उनकी रक्षा करनी होगी।
तुकाराम ने लगातार 13 दिनों तक अन्न का एक दाना और जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की। वे केवल अश्रु बहाते हुए विट्ठल-विट्ठल पुकारते रहे।
तेरहवें दिन का अलौकिक दृश्य
तेरहवें दिन अचानक इंद्रायणी नदी के जल में एक दिव्य हलचल हुई। नदी की अथाह गहराइयों से पत्थरों से बंधी वे सभी बहियां पानी के ऊपर तैरने लगीं! जब ग्रामीणों और पंडितों ने आश्चर्य से दौड़कर उन बहियों को बाहर निकाला, तो उनके होश उड़ गए — कागज और स्याही बिल्कुल सूखी थी, उन पर पानी की एक बूंद तक नहीं लगी थी!
यह देखकर रूढ़िवादी पंडित रामेश्वर भट्ट और मंबाजी की आंखें शर्म से झुक गईं। वे तुकाराम के चरणों में गिर पड़े और बोले, “महाराज! आप साक्षात ईश्वर के अवतार हैं। हमने आपके साथ घोर अपराध किया है, हमें क्षमा करें।” इसके बाद पूरे महाराष्ट्र में तुकाराम की जय-जयकार गूंज उठी।
छत्रपति शिवाजी महाराज और संत तुकाराम का पावन संबंध
जब हिंदवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज ने संत तुकाराम के अलौकिक त्याग और कीर्तन की ख्याति सुनी, तो उनके मन में दर्शन की तीव्र इच्छा हुई।
शिवाजी महाराज ने अपने दूतों के हाथों सोने की मोहरें, बहुमूल्य रत्न, जरीदार रेशमी वस्त्र और हाथी-घोड़े उपहार स्वरूप देहू भिजवाए। लेकिन जब तुकाराम ने वह सारा खजाना देखा, तो उन्होंने एक क्षण भी सोचे बिना उसे वापस लौटा दिया। उन्होंने एक प्रसिद्ध अभंग लिखकर भेजा:
“हे राजन! यह सोना-चांदी हमारे लिए मिट्टी और कंकड़ के समान है। हमें संसार के किसी धन की लालसा नहीं है। हमारा तो एकमात्र सच्चा धन भगवान विट्ठल का नाम है। यदि आप सचमुच हमें कुछ देना चाहते हैं, तो अपनी प्रजा की रक्षा कीजिए और धर्म की मर्यादा बनाए रखिए।”
तुकाराम के इस परम वैराग्य को देखकर शिवाजी महाराज स्वयं नंगे पैर देहू पहुंचे और उन्होंने तुकाराम के चरणों में बैठकर कीर्तन सुना।
कीर्तन में मुगलों का घेरा और विट्ठल की लीला
एक बार जब शिवाजी महाराज लोहगांव में तुकाराम का कीर्तन सुन रहे थे, तभी मुगल सेनापति को गुप्त सूचना मिल गई। मुगलों की 2,000 सैनिकों की टुकड़ी ने उस कीर्तन मंडप को चारों तरफ से घेर लिया ताकि शिवाजी को जीवित पकड़ा जा सके।
सभा में भगदड़ मचने लगी, लेकिन तुकाराम ने शांत भाव से कहा, “घबराओ मत, विट्ठल पर भरोसा रखो।” तभी एक अद्भुत चमत्कार हुआ। भगवान विट्ठल ने उस मंडप में शिवाजी महाराज जैसे दिखने वाले सैकड़ों रूप प्रकट कर दिए। मुगल सैनिक भ्रमित हो गए कि असली शिवाजी कौन हैं। वे पागलों की तरह इधर-उधर दौड़ने लगे और इसी बीच असली शिवाजी महाराज सुरक्षित रूप से किले की ओर निकल गए।
सशरीर वैकुंठ गमन: मृत्यु से परे का महाप्रयाण
संवत 1707 (1650 ईस्वी) के फाल्गुन वद्य द्वितीया के दिन, जिसे आज पूरे महाराष्ट्र में ‘तुकाराम बीज’ के रूप में मनाया जाता है, तुकाराम ने अपने समस्त भक्तों और वारकरियों को इंद्रायणी के तट पर बुलाया।
उस दिन उनके कीर्तन में एक अलग ही अलौकिक तेज था। उन्होंने सभी को गले लगाया और अपना अंतिम अमर अभंग गाया:
“आम्ही जातो आमुच्या गावा। आमुचा राम राम घ्यावा॥
कृत्य होते ते आम्ही केले। विठ्ठल चरणी मन ठेविले॥”
(अर्थात: अब हम अपने असली गांव वैकुंठ जा रहे हैं, आप सभी हमारा अंतिम राम-राम स्वीकार करें। जो कार्य ईश्वर ने हमें सौंपा था, वह हमने पूरा कर लिया है और अपना मन सदा के लिए विट्ठल के चरणों में समर्पित कर दिया है।)
जैसे ही यह अभंग पूरा हुआ, आकाश में एक तीव्र गड़गड़ाहट हुई। सूर्य के समान चमचमाता हुआ एक दिव्य गरुड़-विमान आकाश से सीधे इंद्रायणी के तट पर उतरा। हजारों भक्तों की आंखों के सामने, संत तुकाराम सशरीर उस विमान में आरूढ़ हुए। पूरे आकाश से फूलों की मूसलाधार वर्षा होने लगी।
देखते ही देखते वह दिव्य विमान प्रकाश के एक महा-पुंज के साथ आकाश में विलीन हो गया। जमीन पर केवल संत तुकाराम की करताल (चिपली), वीणा और उनका कंबल पड़ा हुआ मिला! उनका कोई पार्थिव शरीर पृथ्वी पर नहीं रहा, वे सशरीर परमात्मा में समा गए।
संत तुकाराम के प्रमुख उपदेश और अभंग (Master Table)
संत तुकाराम की शिक्षाएं बहुत ही व्यावहारिक और सीधे दिल को छूने वाली हैं:
| प्रमुख अभंग / उक्ति | मूल भाव | जीवन की सीख |
|---|---|---|
| “जे का रंजले गांजले…” | दीन-दुखियों की सेवा | ईश्वर केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि गरीब और असहाय लोगों के आंसुओं में बसता है। |
| “वृक्ष वल्ली आम्हां सोयरीं वनचरें…” | प्रकृति और पर्यावरण प्रेम | पेड़, पौधे, नदियां और पशु-पक्षी हमारे सगे संबंधी हैं; पर्यावरण की रक्षा ही सच्ची भक्ति है। |
| “नाठाळाचे माथीं हाणू काठी…” | अधर्म और दुष्टता का विरोध | संत केवल क्षमाशील ही नहीं होते, दुष्टों और पाखंडियों को सही रास्ते पर लाने के लिए कठोर होना भी जरूरी है। |
| “जोडोनियां धन उत्तम व्यवहारे…” | ईमानदारी से आजीविका | धन हमेशा सत्य और ईमानदारी के मार्ग से कमाना चाहिए और उसका सदुपयोग परोपकार में करना चाहिए। |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
१. संत तुकाराम का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
संत तुकाराम का जन्म 17वीं शताब्दी के आरंभ में (लगभग 1598 या 1608 ईस्वी) महाराष्ट्र के पुणे जिले में पवित्र इंद्रायणी नदी के तट पर स्थित देहू गांव में हुआ था।
२. संत तुकाराम के आराध्य देव कौन थे और उनका संप्रदाय क्या है?
संत तुकाराम के आराध्य देव भगवान विट्ठल (पांडुरंग / श्री कृष्ण) थे, जिनका मुख्य धाम पंढरपुर में है। वे ‘वारकरी संप्रदाय’ के सबसे प्रमुख संत थे, जो आषाढ़ी और कार्तिकी एकादशी पर पंढरपुर की पैदल वारी करते हैं।
३. इंद्रायणी नदी में अभंगों के डूबने का चमत्कार क्या था?
जब रूढ़िवादी पंडितों ने तुकाराम की अभंगों से भरी बहियों को पत्थरों से बांधकर इंद्रायणी नदी में डुबो दिया, तो तुकाराम ने 13 दिनों तक नदी किनारे बैठकर अन्न-जल त्यागकर तप किया। 13वें दिन वे सभी पांडुलिपियां बिना भीगे, सूखी अवस्था में पानी की सतह पर तैरती हुई बाहर आ गईं।
४. छत्रपति शिवाजी महाराज और संत तुकाराम का क्या संबंध था?
छत्रपति शिवाजी महाराज संत तुकाराम के अनन्य प्रशंसक और उनके आध्यात्मिक उपदेशों के अनुयायी थे। शिवाजी महाराज स्वयं देहू जाकर तुकाराम का कीर्तन सुनते थे, और तुकाराम ने उन्हें स्वराज्य की रक्षा और प्रजा-पालन के लिए मार्गदर्शन दिया था।
५. संत तुकाराम का महाप्रयाण (वैकुंठ गमन) कैसे हुआ था?
संत तुकाराम की कोई सामान्य मृत्यु नहीं हुई थी। फाल्गुन वद्य द्वितीया (तुकाराम बीज) के दिन देहू में इंद्रायणी तट पर कीर्तन करते हुए वे आकाश से उतरे एक दिव्य गरुड़-विमान में सशरीर आरूढ़ होकर सीधे वैकुंठ धाम चले गए थे।
निष्कर्ष: कलियुग में भक्ति का अमर प्रकाश-स्तंभ
संत तुकाराम का जीवन हमें सिखाता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि आपके हृदय में ईश्वर के प्रति सच्चा प्रेम और गरीबों के प्रति दया है, तो कोई भी संकट आपको डिगा नहीं सकता।
उन्होंने सिद्ध कर दिया कि भगवान को पाने के लिए जंगल जाने या घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं है; अपने परिवार में रहकर, ईमानदारी की कमाई खाकर और हर प्राणी में विट्ठल का रूप देखकर भी मोक्ष पाया जा सकता है। आज भी जब लाखों वारकरी सिर पर तुलसी का पौधा और हाथ में वीणा लेकर पंढरपुर की ओर कदम बढ़ाते हैं, तो हवाओं में केवल एक ही गूंज होती है — “ज्ञानोबा-तुकाराम! ज्ञानोबा-तुकाराम!”





