संत रविदास — समानता के संत

भारतीय इतिहास में जब भी सामाजिक समानता, मानवीय गरिमा और सच्ची आध्यात्मिकता की बात होती है, तो संत शिरोमणि रविदास जी (Sant Ravidas / Raidas) का नाम सबसे श्रद्धा और आदर के साथ लिया जाता है। 15वीं शताब्दी के बनारस (काशी) में जब समाज जाति-पांति, छुआछूत, ऊंच-नीच और खोखले धार्मिक कर्मकांडों के घोर अंधकार में जकड़ा हुआ था, तब संत रविदास ने अपने पवित्र चरित्र, निर्गुण भक्ति और श्रम की गरिमा से एक नई क्रांति का सूत्रपात किया।

संत रविदास किसी राजघराने या उच्च कुलीन परिवार से नहीं थे। वे एक तथाकथित ‘चमार’ (चर्मकार) जाति के एक अत्यंत निर्धन परिवार में जन्मे थे और जीवन भर अपने हाथों से जूते गांठकर अपना पेट भरते रहे। लेकिन उनकी आत्मा इतनी निर्मल, उनका ज्ञान इतना गहरा और उनकी ईश्वर-भक्ति इतनी अनन्य थी कि मेवाड़ की महारानी मीराबाई ने उन्हें अपना गुरु माना, चित्तौड़ के महाराणा उनके चरणों में झुके, और दिल्ली के क्रूर सुल्तान सिकंदर लोदी को भी उनके सामने शीश नवाना पड़ा।

उनकी प्रसिद्ध उक्ति “मन चंगा तो कठौती में गंगा” आज 600 साल बाद भी भारत के हर बच्चे की जुबान पर है। इस विस्तृत लेख में हम संत रविदास के जन्म, उनके चमत्कारों, कठौती में गंगा प्रकट होने की अमर कथा, उनके सपनों के समतावादी समाज ‘बेगमपुरा’, मीराबाई के साथ संबंध, और गुरु ग्रंथ साहिब में उनकी वाणियों के महत्व को बहुत ही सरल, आत्मीय और बोलचाल की हिंदी में जानेंगे।

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जन्म और बाल्यकाल: सीर गोवर्धनपुर में पावन प्राकट्य

संत रविदास का जन्म 14वीं-15वीं शताब्दी (लगभग संवत 1433 / 1377 या 1398 ईस्वी) में माघ पूर्णिमा के पावन दिन धर्मनगरी काशी (वाराणसी) के निकट स्थित सीर गोवर्धनपुर नामक गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री संतोख दास (रग्घु जी) और माता का नाम श्रीमती कलसा देवी था।

उनका परिवार चर्मकार (जूते बनाने और चमड़े का काम करने) का पैतृक कार्य करता था। तत्कालीन समाज में इस कार्य को अत्यंत हीन और अछूत माना जाता था। लेकिन रविदास जी के परिवार में भगवान की पूजा-अर्चना और संतों की सेवा का वातावरण था। बालक रविदास का बचपन से ही स्वभाव अत्यंत शांत, दयालु और परोपकारी था।

श्रम की गरिमा: जूते सिलते हुए परमात्मा का ध्यान

रविदास जी ने अपने पैतृक कार्य को कभी हीन भावना से नहीं देखा। वे कहते थे कि ईमानदारी से की गई मेहनत कभी अपवित्र नहीं हो सकती; अपवित्र तो वह इंसान है जो दूसरों का हक छीनता है, झूठ बोलता है और घमंड करता है। वे दिन भर अपनी छोटी सी दुकान में बैठकर जूते सिलते, पुरानी जूतियों की मरम्मत करते और बदले में जो दो-चार पैसे मिलते, उसी से अपना जीवन चलाते थे।

उनका दिल इतना कोमल था कि यदि कोई गरीब, असहाय, साधु या फकीर नंगे पैर आ जाता, तो रविदास जी बिना एक भी पैसा लिए अपने हाथों से सिली हुई नई जूती उसे पहना देते थे।

माता-पिता द्वारा घर से अलग किया जाना

जब पिता संतोख दास ने देखा कि बेटा व्यापार में मुनाफा कमाने के बजाय बनी-बनाई जूतियां मुफ्त में दान कर देता है और पैसे घर नहीं लाता, तो वे नाराज हो गए। उन्होंने रविदास जी और उनकी पत्नी (लोना देवी) को घर से निकाल दिया और घर के पिछवाड़े में एक छोटी सी फूस की झोपड़ी दे दी।

रविदास जी ने बिना किसी शिकायत के हंसते-मुस्कुराते इस गरीबी को स्वीकार किया। वे अपनी झोपड़ी में ही जूते बनाते, प्रभु का भजन करते और जो कुछ रूखा-सूखा मिलता, उसे भगवान का प्रसाद मानकर आनंद से खाते थे।

“मन चंगा तो कठौती में गंगा”: अमर कहावत की सच्ची कथा

संत रविदास के जीवन की सबसे लोकप्रिय और कालजयी घटना उनके उस बर्तन से जुड़ी है जिसमें वे चमड़े को मुलायम करने के लिए पानी भिगोकर रखते थे। इस लकड़ी के बर्तन को स्थानीय भाषा में ‘कठौती’ कहा जाता है।

काशी के पंडितों का गंगा स्नान और तांबे की सुपारी

एक बार माघ पूर्णिमा के दिन काशी के कुछ ब्राह्मण और पंडित गंगा स्नान के लिए जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने रविदास जी की झोपड़ी के पास रुककर कहा, “रविदास! आज बड़ा पावन पर्व है, तुम भी हमारे साथ चलो और गंगा मैया में डुबकी लगाकर अपने पाप धो लो।”

रविदास जी ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से कहा:

“पंडित जी! मुझे आज शाम तक एक ग्राहक को जूते बनाकर देने हैं। यदि मैं आपके साथ गंगा स्नान के लिए चला गया, तो मेरा वह काम अधूरा रह जाएगा और मेरा वचन टूट जाएगा। अपने वचन और कर्तव्य का पालन करना ही मेरी सबसे बड़ी पूजा है। इसलिए मैं नहीं चल पाऊंगा।”

इसके बाद रविदास जी ने अपनी जेब से एक तांबे का सिक्का (कुछ प्रसंगों में एक सुपारी) निकाला और उस ब्राह्मण को देते हुए कहा, “महाराज! मेरी तरफ से यह छोटी सी भेंट गंगा मैया को अर्पित कर दीजिएगा। लेकिन एक बात का ध्यान रखिएगा — यह भेंट तभी दीजिएगा जब गंगा मैया साक्षात अपने हाथों से इसे स्वीकार करें, वरना इसे वापस ले आइएगा।”

गंगा मैया का साक्षात हाथ और सोने का कंगन

पंडित जी ने मन ही मन सोचा कि यह चमार भी कितना पागल है, भला गंगा मैया कहीं हाथ निकालकर भेंट लेती हैं! लेकिन जब वे गंगा तट पर पहुंचे और स्नान-पूजा के बाद उन्होंने जल में हाथ जोड़कर कहा, “हे गंगा मैया! यह भेंट आपके भक्त रविदास ने भेजी है।”

तभी एक अलौकिक चमत्कार हुआ! गंगा के पवित्र जल से साक्षात एक अत्यंत सुंदर, स्वर्ण-जड़ित कंगन पहने हुए दिव्य स्त्री का हाथ बाहर निकला और उसने पंडित जी की हथेली से वह तांबे का सिक्का स्वीकार कर लिया! बदले में उस दिव्य हाथ ने पंडित जी को रत्नों से जड़ा हुआ एक अत्यंत बहुमूल्य सोने का कंगन देते हुए कहा, “यह कंगन मेरे परम भक्त रविदास को दे देना।”

पंडित का लालच और राजा का कोप

पंडित जी के मन में लालच आ गया। उन्होंने सोचा कि इस अनमोल कंगन की कीमत एक साधारण चमार क्या जानेगा? वे उस कंगन को लेकर सीधे काशी नरेश के राजमहल पहुंचे और राजा को वह कंगन भेंट कर दिया। राजा ने प्रसन्न होकर वह कंगन अपनी रानी को दे दिया।

रानी उस कंगन की सुंदरता देखकर इतनी मोहित हो गईं कि उन्होंने हठ पकड़ लिया, “मुझे दूसरे हाथ के लिए भी बिल्कुल ऐसा ही दूसरा कंगन चाहिए! यदि कल सुबह तक दूसरा कंगन नहीं मिला, तो मैं अपने प्राण त्याग दूंगी।”

राजा ने तुरंत उस पंडित को बुलाया और कठोर आदेश दिया, “कल सुबह तक दूसरा कंगन लाओ, वरना तुम्हें सूली पर चढ़ा दिया जाएगा!” पंडित के पसीने छूट गए। वह रोता-बिलखता सीधे संत रविदास की झोपड़ी में पहुंचा और उनके चरणों में गिरकर अपने पाप की पूरी सच्चाई बताई।

कठौती से प्रकट हुआ दूसरा कंगन

संत रविदास के चेहरे पर न तो कोई क्रोध था और न ही कोई अहंकार। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “पंडित जी! घबराइए मत, गंगा मैया दयालु हैं।”

रविदास जी ने अपनी वही चमड़ा भिगोने वाली गंदे पानी की लकड़ी की कठौती उठाई। उन्होंने आंखें बंद कीं और गंगा मैया का ध्यान किया। जैसे ही उन्होंने कठौती के पानी में हाथ डाला, पानी से दिव्य प्रकाश चमका और गंगा मैया का वही हाथ कठौती के भीतर से प्रकट हुआ, जिसकी हथेली पर वैसा ही दूसरा सोने का कंगन रखा हुआ था!

पंडित जी के पैरों तले जमीन खिसक गई। तब संत रविदास ने दुनिया को यह अमर ज्ञान दिया:

“मन चंगा तो कठौती में गंगा!”
(अर्थात: यदि आपका मन शुद्ध, निष्कपट और पवित्र है, तो बाहर किसी नदी या तीर्थ में भटकने की जरूरत नहीं है; आपके कर्म करने का यह साधारण बर्तन भी साक्षात गंगा का रूप बन जाता है!)

‘बेगमपुरा’ — समतावादी और शोषण-मुक्त समाज का पहला खाका

संत रविदास केवल एक भक्त कवि नहीं थे, बल्कि वे दुनिया के सबसे पहले ऐसे दूरदर्शी समाज-सुधारक थे जिन्होंने एक आदर्श समतावादी राज्य (Utopia) की कल्पना की थी। उन्होंने अपनी एक प्रसिद्ध कविता में इस राज्य का नाम दिया था — ‘बेगमपुरा’ (Begampura), जिसका शाब्दिक अर्थ है ‘वह शहर जहाँ कोई गम (दुख या पीड़ा) न हो’।

“बेगम पुरा सहर को नाउ। दूखु इंदोहु नही तिहि ठाउ॥
ना तसवीस खिराजु न मालु। खौफु न खता न तरसु जवालु॥”

रविदास जी के बेगमपुरा की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार थीं:

  • कोई टैक्स या शोषण नहीं: जहाँ किसी गरीब या किसान पर कोई राजा जुल्म न करे, कोई अनुचित लगान या टैक्स न वसूला जाए।
  • जाति और वर्ग का कोई भेद नहीं: जहाँ न कोई ब्राह्मण हो, न कोई शूद्र; न कोई मालिक हो और न कोई गुलाम। सब इंसान के रूप में बराबर हों।
  • भय और चिंता से मुक्ति: जहाँ किसी को गरीबी, भुखमरी, बीमारी या अपमान का डर न हो। सब अपनी मेहनत की रोटी खाएं और सम्मान से जिएं।
  • पूर्ण स्वतंत्रता: जहाँ हर नागरिक को कहीं भी आने-जाने, विचार रखने और अपनी मर्जी से जीने की पूरी आजादी हो।

पश्चिमी दुनिया के विचारकों जैसे थॉमस मूर या कार्ल मार्क्स ने समाजवाद की बात बहुत बाद में की, लेकिन संत रविदास ने 15वीं सदी में ही भारत की पावन भूमि पर इस शोषण-मुक्त, लोकतांत्रिक समाज का सपना देख लिया था।

चित्तौड़ की महारानी मीराबाई के गुरु

संत रविदास के जीवन का एक सबसे क्रांतिकारी पहलू था मेवाड़ की महारानी मीराबाई का उनका शिष्य बनना।

मीराबाई एक क्षत्राणी राजपूत राजकुमारी थीं और मेवाड़ के महाराणा सांगा की बड़ी बहू थीं। उस दौर में राजपूत समाज में पर्दा-प्रथा और जातिगत श्रेष्ठता का अत्यंत कड़ा नियम था। लेकिन जब मीराबाई को सत्य की खोज में कोई सच्चा मार्गदर्शक नहीं मिला, तो वे संतों की खोज में काशी पहुंचीं।

काशी में उन्होंने जब संत रविदास के वचनों को सुना, तो उनका हृदय गद्गद हो गया। उन्होंने बिना किसी झिझक के एक तथाकथित अछूत संत के चरणों में अपना सिर रख दिया और उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु स्वीकार किया। मीरा ने अपने पदों में गर्व के साथ गाया:

“गुरु मिल्या रैदास जी, दीन्हीं ज्ञान की गुटकी।
सत की सुरति समानी, छूट गई जग की छुटकी॥”

जब चित्तौड़ के रूढ़िवादी पंडितों ने इस बात का विरोध किया कि एक रानी होकर तुमने चमार को गुरु कैसे बना लिया, तो मीरा ने स्पष्ट कहा कि “ईश्वर के दरबार में केवल भक्ति और प्रेम की परीक्षा होती है, वहाँ कोई चमड़ी का रंग या जाति नहीं देखता।” संत रविदास और मीराबाई का यह संबंध भारतीय इतिहास में जातिवाद पर किया गया सबसे बड़ा आध्यात्मिक प्रहार है।

सिकंदर लोदी और संत रविदास प्रसंग: जब सुल्तान झुका

उस समय दिल्ली की गद्दी पर क्रूर और धर्मांध सुल्तान सिकंदर लोदी का शासन था। जब सिकंदर लोदी काशी आया, तो उसने देखा कि हिंदू और मुसलमान दोनों ही बड़ी संख्या में संत रविदास के वचनों को सुनने के लिए उनकी कुटिया में उमड़ रहे हैं।

सिकंदर लोदी ने सोचा कि यदि इस प्रभावशाली संत को इस्लाम कबूल करवा लिया जाए, तो उसके लाखों अनुयायी भी अपने आप मुसलमान बन जाएंगे। लोदी ने रविदास जी को अपने दरबार में बुलाया और उन्हें अपार धन-दौलत, सोने-चांदी और ऊंचे पद का लालच दिया। जब रविदास जी नहीं माने, तो लोदी ने तलवार दिखाकर उन्हें जान से मारने की धमकी दी।

संत रविदास ने मुस्कुराते हुए निर्भीकता से उत्तर दिया:

“वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान।
फिर मैं क्यों छोड़ूं इसे, सुनकर झूठ विधान॥
कहा करैगो काजियों, जो तू काटे मोय।
यह तन माटी में मिलै, राम न छूटे मोय॥”

क्रोधित होकर सिकंदर लोदी ने उन्हें कारागार में डाल दिया और उन्हें चमड़ा कूटने व कोल्हू चलाने का कठोर दंड दिया। लेकिन कथा के अनुसार, जेल में भगवान की कृपा से कोल्हू अपने आप चलने लगा और संत रविदास अपनी कोठरी में आराम से समाधि में लीन रहे। यह देखकर सिकंदर लोदी भयभीत हो गया। उसे अहसास हुआ कि यह कोई साधारण इंसान नहीं, बल्कि साक्षात खुदा का सच्चा बंदा है। लोदी ने स्वयं जेल में जाकर उनके पैर छुए, क्षमा मांगी और उन्हें ससम्मान रिहा किया।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संत रविदास की पावन वाणी

संत रविदास के वचनों की पवित्रता और गहराई का सबसे बड़ा सम्मान तब हुआ जब सिख धर्म के पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जुन देव जी ने पवित्र ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब’ का संपादन किया।

उन्होंने संत रविदास जी के 41 पावन शबदों (पदों) को 16 विभिन्न रागों में पूरे सम्मान के साथ गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान दिया। आज भी दुनिया भर के किसी भी गुरुद्वारे में जब गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ होता है, तो संत रविदास जी की वाणी को साक्षात गुरु-वाणी के समान ही नमन किया जाता है:

“तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा। कनक कतिक जल तरंग जैसा॥”
(अर्थात: हे प्रभु! मुझमें और आपमें कैसा भेद? ठीक वैसा ही जैसा सोने और सोने के कंगन में होता है, या जल और जल की तरंग में होता है!)

संत रविदास के प्रमुख दोहे और उनकी अमर शिक्षाएं (Master Table)

संत रविदास के दोहे बहुत ही सरल, सीधे और दिल को झकझोर देने वाले हैं:

अमर दोहा / पद मुख्य भाव जीवन की सीख
“प्रभु जी तुम चंदन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।” अनन्य आत्म-समर्पण परमात्मा चंदन हैं और भक्त पानी; जब दोनों मिलते हैं तो भक्त का पूरा जीवन ईश्वर की सुगंध से महक उठता है।
“जन्म जात मत पूछिए, का जात अरु पात। रैदास पूत सब प्रभ के, कोउ नहिं जात-कुजात॥” जातिवाद का पूर्ण खंडन सारे इंसान एक ही परमपिता परमेश्वर की संतान हैं; कोई जन्म से ऊंचा या नीचा नहीं होता।
“रैदास श्रम करि खाइए, जौ लौं पार बसाय। नेक कमाई जौ करै, कबहूँ न निष्फल जाय॥” श्रम और ईमानदारी की कमाई अपनी मेहनत और पसीने की कमाई ही सबसे पवित्र है; मुफ्त का धन या बेईमानी कभी शांति नहीं देती।
“ऐसा चाहूँ राज मैं, जहाँ मिलै सबन को अन्न। छोट-बड़ो सब सम बसै, रैदास रहै प्रसन्न॥” समतावादी आदर्श राज्य एक ऐसा समाज जहाँ कोई भूखा न सोए और छोटे-बड़े सभी को समानता और सम्मान का अधिकार मिले।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

१. संत रविदास का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

संत रविदास जी का जन्म 15वीं शताब्दी में माघ पूर्णिमा के दिन काशी (वाराणसी) के पास सीर गोवर्धनपुर गांव में एक चर्मकार परिवार में हुआ था।

२. “मन चंगा तो कठौती में गंगा” का वास्तविक अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है कि यदि मनुष्य का मन शुद्ध, कपट-रहित और सात्विक है, तो उसे किसी बाहरी नदी या तीर्थ में भटकने की आवश्यकता नहीं है। उसके दैनिक कर्म करने का साधारण बर्तन (कठौती) भी साक्षात गंगा के समान पवित्र तीर्थ बन जाता है।

३. संत रविदास के ‘बेगमपुरा’ का क्या विचार है?

‘बेगमपुरा’ संत रविदास द्वारा कल्पित एक ऐसा आदर्श और शोषण-मुक्त समाज है जहाँ कोई दुख, चिंता, जातिगत भेदभाव, गरीबी या गैर-बराबरी न हो; और जहाँ सभी नागरिकों को समानता, स्वतंत्रता और गरिमा प्राप्त हो।

४. क्या मीराबाई सचमुच संत रविदास की शिष्या थीं?

हाँ, यह ऐतिहासिक और आध्यात्मिक रूप से पूर्णतः प्रामाणिक है। चित्तौड़ की महारानी मीराबाई ने काशी आकर संत रविदास को अपना गुरु बनाया था और अपने कई पदों में इसका कृतज्ञतापूर्वक उल्लेख किया है।

५. श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संत रविदास के कितने पद शामिल हैं?

सिख धर्म के सर्वोच्च ग्रंथ ‘श्री गुरु ग्रंथ साहिब’ में संत रविदास जी के 41 पावन शबद (पद) विभिन्न 16 रागों में पूरे सम्मान के साथ संकलित हैं।

निष्कर्ष: आज भी करोड़ों दिलों के मार्गदर्शक

संत रविदास केवल एक संत नहीं थे, वे मानवीय स्वाभिमान और समानता के अग्रदूत थे। उन्होंने दुनिया को सिखाया कि कोई भी काम छोटा नहीं होता; छोटा होता है इंसान का अहंकार और उसकी संकीर्ण सोच।

जब तक दुनिया में गैर-बराबरी, नफरत और जातिगत भेदभाव रहेगा, तब तक संत रविदास का संदेश समाज के लिए एक जलते हुए दीपक की तरह रोशनी देता रहेगा। उनका जीवन हर इंसान को यह प्रेरणा देता है कि अपने कर्म पर गर्व करो, मन को पवित्र रखो, और हर प्राणी में उस परमात्मा का दर्शन करो — “प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा।”

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