परिचय: नवनाथ कौन हैं? नौ महासिद्धों की अमर गाथा
सनातन भारत की पावन भूमि पर अनेक संप्रदाय और परंपराएं जन्मीं, लेकिन जिस परंपरा ने मनुष्य की देह को ‘वज्र’ बनाकर, प्रकृति के नियमों को चुनौती देते हुए ईश्वरीय चेतना को जन-जन तक पहुँचाया, वह है—नाथ संप्रदाय (Nath Sampradaya)। और इस संप्रदाय के प्राण और आधार हैं—‘नवनाथ’ (Navnath), यानी नौ अमर महासिद्ध।
महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब और नेपाल में शायद ही कोई ऐसा गाँव या कस्बा हो जहाँ ‘नवनाथ’ का नाम श्रद्धा से न लिया जाता हो। विशेष रूप से महाराष्ट्र में ‘श्री नवनाथ भक्तिसार’ (Navnath Bhaktisar) और नवनाथ पोथी का नित्य पाठ घर-घर में संकट-निवारण, शांति और आरोग्यता के लिए किया जाता है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु के ‘नौ नारायण’ (Nava Narayanas) ने कलयुग के जीवों के उद्धार के लिए पृथ्वी पर अवतार लेने का संकल्प लिया, तो वे देवाधिदेव महादेव (आदिनाथ) की कृपा से नौ नाथ सिद्धों के रूप में प्रकट हुए। इन नौ नाथों ने न केवल हठयोग, कायाकल्प और आयुर्वेद को नई ऊंचाइयां दीं, बल्कि ‘शाबर मंत्रों’ की रचना करके साधारण से साधारण मनुष्य को भी आध्यात्मिक शक्ति प्रदान की। आइए, इस विस्तृत लेख में नौ नाथों के नाम, उनके अलौकिक जन्म की कहानियाँ, राजा गोपीचंद और भर्तृहरि के वैराग्य, नवनाथ भक्तिसार के महत्व और उनकी अमर शिक्षाओं को सरल, बोलचाल की हिंदी में गहराई से समझें।
नौ नाथ सिद्धों के नाम और उनका स्वरूप
विभिन्न ग्रंथों (जैसे हठयोग प्रदीपिका, गोरक्ष संहिता और नवनाथ भक्तिसार) में नौ नाथों के नामों में कुछ सूक्ष्म भेद मिलता है, लेकिन जन-जन में जो नौ नाम सबसे अधिक प्रामाणिक और पूजनीय माने जाते हैं, वे निम्नलिखित हैं:
- श्री आदिनाथ (भगवान शिव): नाथ परंपरा के मूल स्रोत और प्रथम गुरु।
- श्री मत्स्येंद्रनाथ (मछिंद्रनाथ): मछली के उदर से प्रकट हुए, ज्ञान के प्रथम मानवीय प्रचारक।
- श्री गोरखनाथ (गोरक्षनाथ): हठयोग के प्रवर्तक और सिद्धों के शिरोमणि।
- श्री जालंधरनाथ (ज्वालेंद्रनाथ): अग्नि कुंड से प्रकट, हस्तिनापुर और पंजाब के उद्धारक।
- श्री कानिफनाथ (काणिफा): हाथी के कान से प्रकट, जालंधरनाथ के प्रिय शिष्य।
- श्री गहनीनाथ (गैबीनाथ): गोरखनाथ के शिष्य और संत ज्ञानेश्वर की गुरु-परंपरा के मूल।
- श्री भर्तृहरि नाथ (राजा भर्तृहरि): उज्जैन के प्रतापी चक्रवर्ती राजा, जो वैराग्य धारण कर सिद्ध योगी बने।
- श्री रेवणनाथ (रेवनाथ / कडासिद्ध): रेवती नक्षत्र में प्रकट, दक्षिण भारत और महाराष्ट्र के सिद्ध।
- श्री चर्पटीनाथ (चरपटनाथ): रस-शास्त्र, कीमियागिरी और दिव्य जड़ी-बूटी विद्या के आचार्य।
नवनाथों की विस्तृत तुलनात्मक तालिका (Comprehensive Chart)
| नाथ सिद्ध | नारायण अवतार | प्राकट्य कथा / उत्पत्ति | प्रमुख विशेषता / सिद्धि | प्रधान तपोभूमि / पीठ |
|---|---|---|---|---|
| 1. आदिनाथ | साक्षात शिव | सृष्टि के आदि में स्वयंभू | समस्त योग और तंत्र के आदि-स्रोत। | कैलाश मानसरोवर। |
| 2. मत्स्येंद्रनाथ | कवि नारायण | मछली के पेट से प्राकट्य | शिव-पार्वती का गुप्त ज्ञान सुना; कौल ज्ञान। | उज्जैन / काठमांडू (नेपाल)। |
| 3. गोरखनाथ | हरि नारायण | गोबर और भभूत के ढेर से | हठयोग, कायाकल्प, वज्र देह, शाबर मंत्र। | गोरखपुर (उत्तर प्रदेश)। |
| 4. जालंधरनाथ | अंतरिक्ष नारायण | यज्ञ की ज्वाला से प्राकट्य | जालंधर बंध के प्रवर्तक; प्रचंड तपोबल। | जालंधर (पंजाब) / राजस्थान। |
| 5. कानिफनाथ | प्रबुद्ध नारायण | हाथी के कान से प्राकट्य | नाग-विद्या, विष-निवारण, कनिफ-पंथ। | मढ़ी (अहमदनगर, महाराष्ट्र)। |
| 6. गहनीनाथ | करभाजन नारायण | मिट्टी और वनस्पतियों से प्राकट्य | संत ज्ञानेश्वर के गुरु निवृत्तिनाथ के सद्गुरु। | ब्रह्मगिरि (त्र्यंबकेश्वर, नासिक)। |
| 7. भर्तृहरि नाथ | द्रुमिल नारायण | उज्जैन के चक्रवर्ती राजा | वैराग्य शतक, नीति शतक, त्याग की पराकाष्ठा। | भर्तृहरि गुफा (उज्जैन / अलवर)। |
| 8. रेवणनाथ | चमस नारायण | रेवती नक्षत्र में जन्म | कडासिद्ध परंपरा; कर्नाटक व महाराष्ट्र में प्रभाव। | रेवणगांव (सांगली, महाराष्ट्र)। |
| 9. चर्पटीनाथ | भाजन नारायण | कमल के पत्ते से प्राकट्य | रसायन विद्या, पारद विज्ञान, आयुर्वेद। | चंबा (हिमाचल प्रदेश) / हिमालय। |
प्रमुख नवनाथों की अद्भुत गाथाएं और आध्यात्मिक रहस्य
1. मत्स्येंद्रनाथ: मछली के उदर में अमर ज्ञान का श्रवण
कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव क्षीरसागर के शांत तट पर एकांत में माता पार्वती को सृष्टि के गूढ़ अमर-ज्ञान (ब्रह्म-विद्या) का उपदेश दे रहे थे। उपदेश सुनते-सुनते माता पार्वती को थकान के कारण नींद आ गई। लेकिन जल के भीतर तैर रही एक विशाल मछली के पेट में एक नन्हा जीव उस ज्ञान को बड़े ध्यान से सुन रहा था और हर रहस्य पर ‘हूँ… हूँ…’ की गहरी हुंकार भर रहा था।
जब शिवजी को ज्ञात हुआ कि पार्वती सो चुकी हैं और कोई अन्य चेतना यह गोपनीय विद्या सुन रही है, तो उन्होंने जल में दृष्टि डाली। उन्होंने उस मछली के उदर से उस दिव्य बालक को बाहर निकाला। भगवान शिव के ज्ञान के साक्षात स्पर्श से वह बालक तुरंत सिद्ध योगी बन गया। चूँकि उनका प्राकट्य मछली (मत्स्य) के उदर से हुआ था, इसलिए भगवान शिव ने उनका नाम ‘मत्स्येंद्रनाथ’ रखा और उन्हें संसार में योग-ज्ञान के प्रचार का प्रथम आदेश दिया।
2. राजा भर्तृहरि: एक अमर फल और वैराग्य की महागाथा
नवनाथों में उज्जैन के चक्रवर्ती सम्राट राजा भर्तृहरि (Bhartrihari) की कथा त्याग और वैराग्य का सबसे अनूठा और हृदयस्पर्शी उदाहरण है।
राजा भर्तृहरि अपनी रूपवती महारानी पिंगला से अगाध प्रेम करते थे। एक बार एक तपस्वी महात्मा ने राजा की धर्मनिष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें एक अलौकिक ‘अमर फल’ भेंट किया और कहा—“महाराज, इसे जो भी खाएगा, वह सदा के लिए जवान और अमर रहेगा।” राजा ने सोचा कि मैं इस फल को खाकर क्या करूँगा? मेरी प्रिय रानी पिंगला को अमर होना चाहिए ताकि मैं सदा उसके साथ रह सकूँ। राजा ने वह फल चुपचाप रानी पिंगला को दे दिया।
लेकिन रानी पिंगला राजा से नहीं, बल्कि राजमहल के अश्वपाल (सेनापति) से गुप्त प्रेम करती थी। उसने वह अमर फल अश्वपाल को दे दिया। वह अश्वपाल नगर की एक रूपसी नर्तकी से प्रेम करता था, उसने वह फल उस नर्तकी को दे दिया। उस नर्तकी ने जब वह फल देखा, तो उसके मन में ग्लानि हुई: “मैं तो एक पापिनी हूँ। इस नश्वर और कलंकित जीवन में अमर होकर मैं और पाप ही करूँगी। हमारे राजा भर्तृहरि प्रजा के पालक और महान धर्मात्मा हैं, उन्हें अमर रहना चाहिए।” उसने वह फल ले जाकर पुनः राजदरबार में राजा भर्तृहरि को भेंट कर दिया!
संसार की असारता का बोध
जब राजा भर्तृहरि ने अपने ही दिए हुए उस फल को दोबारा देखा और गुप्तचरों द्वारा पूरी सच्चाई जानी, तो उनके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। उनके मन से सांसारिक सुखों, काम-वासना और मोह का परदा सदा के लिए फट गया। उन्होंने कहा:
“यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता, साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या, धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च॥”
(जिसका मैं रात-दिन ध्यान करता हूँ, वह मुझसे विरक्त होकर किसी और को चाहती है… धिक्कार है ऐसी वासना को!) राजा भर्तृहरि ने उसी क्षण अपना राजमुकुट, मखमली वस्त्र और सोने का सिंहासन त्याग दिया। वे जंगल में जाकर गुरु गोरखनाथ के चरणों में गिर पड़े। कठोर साधना करके उन्होंने ‘वैराग्य शतक’, ‘नीति शतक’ और ‘शृंगार शतक’ जैसे अमर ग्रंथों की रचना की और नवनाथों में अमर सिद्ध बने।
3. गुरु जालंधरनाथ और राजा गोपिचंद की कथा: जब माँ ने बेटे को संन्यासी बनाया
नवनाथ परंपरा का एक और अत्यंत मार्मिक प्रसंग गुरु जालंधरनाथ और बंगाल के प्रतापी राजा गोपीचंद से जुड़ा हुआ है।
राजा गोपीचंद की माता रानी मैनावती स्वयं गुरु गोरखनाथ और जालंधरनाथ की शिष्या और एक सिद्ध योगिनी थीं। एक दिन जब राजा गोपीचंद सुगंधित तेल से स्नान कर रहे थे, तो ऊपर झरोखे से उनकी माता मैनावती के आंसुओं की कुछ बूंदें उनके कंधे पर गिरीं। राजा ने ऊपर देखकर पूछा—“माँ! मेरे जैसा रूपवान, प्रतापी और चक्रवर्ती पुत्र पाकर भी तुम्हारी आँखों में आंसू क्यों हैं?”
माता मैनावती ने उत्तर दिया—“बेटा! मैं तुम्हारा यह सुंदर शरीर देखकर रो रही हूँ। यह शरीर चाहे कितना भी सुंदर क्यों न हो, एक दिन यह मिट्टी में मिल जाएगा और काल इसे खा जाएगा। तुम्हारे पिता भी ऐसे ही रूपवान थे, लेकिन वे मृत्यु के मुख में चले गए। मैं नहीं चाहती कि मेरा पुत्र भी काल का ग्रास बने। मैं तुम्हें अमर देखना चाहती हूँ!”
माता मैनावती ने अपने जवान बेटे को राजपाट छोड़कर गुरु जालंधरनाथ की शरण में जाकर संन्यास लेने का आदेश दिया। राजा गोपीचंद ने अपनी 16 रानियों और विशाल साम्राज्य को त्याग दिया और गुरु जालंधरनाथ के शिष्य बनकर कठिन तपस्या की। आगे चलकर राजा गोपीचंद नाथ परंपरा के महान सिद्ध कहलाए।
4. कानिफनाथ, गहनीनाथ और संत ज्ञानेश्वर की कड़ी
गुरु कानिफनाथ (काणिफा) को नाग-विद्या, विष-निवारण और गुप्त तंत्र-विद्याओं का अप्रतिम स्वामी माना जाता है। महाराष्ट्र के अहमदनगर स्थित ‘मढ़ी’ में उनका पावन धाम है।
वहीं गहनीनाथ (गैबीनाथ) जी ने महाराष्ट्र की आध्यात्मिक संस्कृति की दिशा ही बदल दी। गहनीनाथ जी गुरु गोरखनाथ के परम शिष्य थे। उन्होंने नासिक के त्र्यंबकेश्वर (ब्रह्मगिरि पर्वत) पर कठोर साधना की। गहनीनाथ जी ने ही स्वामी निवृत्तिनाथ को दीक्षा दी, और निवृत्तिनाथ जी ने अपने छोटे भाई संत ज्ञानेश्वर को योग और ज्ञान का उपदेश दिया। संत ज्ञानेश्वर ने मात्र 16 वर्ष की आयु में मराठी भाषा में ‘ज्ञानेश्वरी’ (भावार्थ दीपिका) की रचना करके भगवद् गीता के रहस्य को आम जनता तक पहुँचाया। इस प्रकार महाराष्ट्र की प्रसिद्ध वारकरी भक्ति परंपरा का मूल स्रोत साक्षात नाथ परंपरा ही है!
‘श्री नवनाथ भक्तिसार’ (पोथी) का महात्म्य और पारायण
महाराष्ट्र और पश्चिमी भारत में ‘श्री नवनाथ भक्तिसार’ एक अत्यंत जाग्रत और चमत्कारी ग्रंथ माना जाता है। इसमें 40 अध्यायों में नौ नाथों के अलौकिक जन्म, उनकी साधना, मायावी राक्षसों के साथ युद्ध और लोक-कल्याण के कार्यों का भावपूर्ण वर्णन है।
नवनाथ पोथी का पारायण कैसे किया जाता है?
- सप्ताह पारायण (7 दिन): सबसे लोकप्रिय विधि 7 दिनों की होती है। साधक संकल्प लेकर प्रतिदिन निश्चित अध्यायों का पाठ करता है और सातवें दिन हवन व प्रसाद के साथ पारायण पूर्ण होता है।
- पवित्रता और अखंड दीप: पारायण के दौरान घर में शुद्ध सात्विक वातावरण होना चाहिए। पाठ के समय शुद्ध गाय के घी या तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित रखा जाता है।
- मानसिक शांति और संकट-मुक्ति: लोक-अनुभव है कि जिस घर में नवनाथ भक्तिसार का नियमित पाठ होता है, वहाँ से वास्तु-दोष, नकारात्मक शक्तियाँ, भूत-प्रेत बाधा और अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। साधक को आत्म-साक्षात्कार और मानसिक दृढ़ता की प्राप्ति होती है।
शाबर मंत्र: जन-साधारण के लिए नाथों का सबसे बड़ा वरदान
प्राचीन काल में वैदिक मंत्र केवल संस्कृत में होते थे और उनके उच्चारण, स्वर, छंद और न्यास के नियम इतने कठोर थे कि यदि कोई साधारण व्यक्ति तनिक भी अशुद्ध उच्चारण कर दे, तो मंत्र निष्फल हो जाता था या उलटा नुकसान पहुँचाता था।
कलयुग के साधारण, अनपढ़ और ग्रामीण मनुष्यों की पीड़ा देखकर गुरु गोरखनाथ और नवनाथों ने ‘शाबर मंत्र’ (Shabar Mantras) की रचना की:
शाबर मंत्र की विशेषताएँ:
- सरल लोक-भाषा: ये मंत्र संस्कृत के बजाय अवधी, भोजपुरी, ब्रज, राजस्थानी या हरियाणवी जैसी आम बोलचाल की भाषाओं में होते हैं।
- स्वतः सिद्ध (Self-Empowered): इन मंत्रों को सिद्ध करने के लिए लाखों आहुतियाँ देने की ज़रूरत नहीं होती; ये गुरु गोरखनाथ और भगवान शिव की आण (शपथ) से स्वतः सिद्ध माने जाते हैं।
- प्रत्यक्ष प्रभाव: बिच्छू या सांप का जहर उतारना हो, नजर दोष दूर करना हो, रोग मिटाना हो या आत्म-रक्षा करनी हो—शाबर मंत्र तुरंत अचूक प्रभाव दिखाते हैं।
शाबर मंत्रों के अंत में हमेशा गुरु गोरखनाथ, माता पार्वती या भगवान शिव की दुहाई दी जाती है (जैसे—“मेरी भक्ति, गुरु की शक्ति, फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा”)। यह दर्शाता है कि शक्ति मंत्र के कठिन शब्दों में नहीं, बल्कि गुरु के संकल्प और साधक के विश्वास में है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्र. 1: क्या नवनाथ आज भी सूक्ष्म रूप में मार्गदर्शन करते हैं?
उत्तर: हाँ, नाथ परंपरा के साधकों का दृढ़ विश्वास है कि नौ नाथ अमर सिद्ध हैं। वे आज भी हिमालय के गुप्त क्षेत्रों, गिरनार पर्वत (गुजरात), उज्जैन और काशी में सूक्ष्म अथवा प्रकाश शरीर में विचरण करते हैं। जब भी कोई सच्चा साधक श्रद्धापूर्वक उनका स्मरण करता है या नवनाथ पोथी का पाठ करता है, तो उसे उनकी कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है।
प्र. 2: नवनाथ और नौ ग्रहों (Navagrahas) में क्या संबंध है?
उत्तर: नाथ परंपरा में माना जाता है कि नौ नाथ ब्रह्मांड के नौ ग्रहों का प्रतिनिधित्व करते हैं। उदाहरण के लिए, गोरखनाथ सूर्य के, मत्स्येंद्रनाथ चंद्र के, जालंधरनाथ मंगल के और कानिफनाथ शनि के अधिष्ठाता माने जाते हैं। नवनाथों की साधना से कुंडली के सभी नौ ग्रहों के अशुभ प्रभाव शांत हो जाते हैं।
प्र. 3: गिरनार पर्वत (गुजरात) का नवनाथों से क्या संबंध है?
उत्तर: गुजरात का जूनागढ़ स्थित ‘गिरनार पर्वत’ नाथ संप्रदाय का सबसे पवित्र और जाग्रत तीर्थ माना जाता है। यहाँ भगवान दत्तात्रेय और गुरु गोरखनाथ की प्राचीन तपोभूमि है। गिरनार की 10,000 सीढ़ियों की यात्रा करके नाथ सिद्धों के दर्शन करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
प्र. 4: क्या कोई भी साधारण व्यक्ति नवनाथ भक्तिसार का पाठ कर सकता है?
उत्तर: बिल्कुल! इसके लिए किसी जाति, संप्रदाय या दीक्षा का बंधन नहीं है। कोई भी पुरुष या महिला शुद्ध मन और सात्विक आहार के साथ अपने घर में श्रद्धापूर्वक नवनाथ भक्तिसार का पाठ कर सकता है।
निष्कर्ष: अलख निरंजन की पावन ज्योति
नवनाथ परंपरा केवल अतीत का इतिहास नहीं है; यह जीवन को जीने की एक जीवंत कला है।
मत्स्येंद्रनाथ का ज्ञान, गोरखनाथ का हठयोग, राजा भर्तृहरि और राजा गोपीचंद का वैराग्य, और कानिफनाथ का सेवा-भाव हमें सिखाता है कि मनुष्य चाहे कितनी भी सांसारिक विपत्तियों या प्रलोभनों में क्यों न हो, यदि उसकी निष्ठा सत्य और परमात्मा में अडिग है, तो वह काल और मृत्यु के बंधनों को भी पार कर सकता है।
अलख निरंजन । आदेश ! आदेश ! नवनाथ सिद्धेभ्यो नमः ।





