श्री अरबिंदो — क्रांतिकारी से योगी तक

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और विश्व दर्शन के इतिहास में श्री अरबिंदो (Sri Aurobindo Ghosh, 1872–1950) का व्यक्तित्व सबसे अनोखा, विस्मयकारी और प्रेरणादायक है। वे एक ऐसे महामानव थे जिन्होंने अपने जीवन के पहले हिस्से में ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। अंग्रेज पुलिस और वायसराय उन्हें ‘भारत का सबसे खतरनाक और बौद्धिक क्रांतिकारी’ मानते थे। लेकिन अपने जीवन के दूसरे हिस्से में उन्होंने उसी क्रांति को एक ऐसे उच्च आध्यात्मिक धरातल पर पहुंचा दिया, जिसकी गूंज आज पूरी दुनिया में सुनाई देती है।

श्री अरबिंदो ने दुनिया को वह अमर संदेश दिया जिसे हम ‘पूर्ण योग’ (Integral Yoga) कहते हैं। उनका मानना था कि अध्यात्म का मतलब जंगलों या गुफाओं में भाग जाना (पलायनवाद) नहीं है, बल्कि संसार में रहते हुए अपने शरीर, मन और प्राण को इतना दिव्य बना लेना है कि पृथ्वी पर ही एक नई अतिमानसिक चेतना (Supermind) का अवतरण हो सके।

इस विस्तृत लेख में हम श्री अरबिंदो के बचपन, इंग्लैंड में उनकी असाधारण शिक्षा, आईसीएस (ICS) की नौकरी ठुकराना, स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी क्रांतिकारी भूमिका, अलीपुर जेल की कालकोठरी में भगवान श्री कृष्ण के ‘वासुदेव दर्शन’, पांडिचेरी में साधना, ‘द मदर’ (माता जी) का सहयोग, और उनके अमर महाकाव्य ‘सावित्री’ की पूरी गाथा को बहुत ही सरल, आत्मीय और बोलचाल की हिंदी में जानेंगे।

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जन्म और बाल्यकाल: पूर्णतः अंग्रेजियत का वातावरण

श्री अरबिंदो का जन्म 15 अगस्त 1872 को पश्चिम बंगाल के कोलकाता में एक अत्यंत प्रतिष्ठित और समृद्ध परिवार में हुआ था। उनके पिता डॉ. कृष्णधन घोष इंग्लैंड से डॉक्टरेट की डिग्री लेकर लौटे एक प्रख्यात सिविल सर्जन थे। उनकी माता का नाम श्रीमती स्वर्णलता देवी था, जो महान समाज-सुधारक और ब्रह्म समाज के नेता राजनारायण बसु की पुत्री थीं।

डॉ. कृष्णधन घोष पश्चिमी सभ्यता और अंग्रेजों की जीवनशैली से इतने अधिक प्रभावित थे कि वे नहीं चाहते थे कि उनके बच्चों पर भारतीय भाषा, संस्कृति या धर्म का कोई प्रभाव पड़े। उन्होंने घर में भारतीय नौकरों को भी बच्चों से अंग्रेजी में ही बात करने का कड़ा निर्देश दे रखा था।

इंग्लैंड में १४ वर्ष की असाधारण शिक्षा

जब अरबिंदो मात्र 7 वर्ष के थे, तब उनके पिता उन्हें और उनके भाइयों को उच्च शिक्षा के लिए सीधे इंग्लैंड ले गए। अरबिंदो ने मैनचेस्टर के डब्ल्यू.एच. ड्रूवेट के घर रहकर अपनी प्रारंभिक पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने लंदन के प्रख्यात सेंट पॉल स्कूल और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के किंग्स कॉलेज से उच्च शिक्षा प्राप्त की।

  • अरबिंदो की प्रतिभा विलक्षण थी। उन्होंने लैटिन और प्राचीन ग्रीक (यूनानी) साहित्य में इतनी महारत हासिल कर ली कि वे कैम्ब्रिज के शीर्ष विद्यार्थियों में गिने जाने लगे।
  • इसके अलावा उन्होंने अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, इटैलियन और स्पैनिश भाषाओं पर भी पूर्ण अधिकार कर लिया था।

आईसीएस (ICS) परीक्षा उत्तीर्ण की, लेकिन नौकरी ठुकरा दी

पिता की प्रबल इच्छा थी कि अरबिंदो तत्कालीन भारत की सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा — आईसीएस (Indian Civil Service) में अधिकारी बनें। अरबिंदो ने 1890 में मात्र 18 वर्ष की आयु में आईसीएस की अत्यंत कठिन लिखित परीक्षा बहुत उच्च अंकों के साथ पास कर ली।

लेकिन उस समय तक अरबिंदो के अंतर्मन में देशभक्ति की लौ जल चुकी थी। वे किसी भी कीमत पर उन अंग्रेजों के गुलाम या अफसर बनकर अपने देशवासियों का शोषण नहीं करना चाहते थे जिन्होंने उनकी मातृभूमि को बेड़ियों में जकड़ रखा था। इसलिए उन्होंने अंतिम घुड़सवारी (Horse Riding) की परीक्षा में जानबूझकर उपस्थित होने से इनकार कर दिया, जिसके कारण उन्हें सेवा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया। यह गुलामी की नौकरी को लात मारने का उनका पहला मौन विद्रोह था।

भारत वापसी और बड़ौदा में राष्ट्रीय चेतना का विकास (1893–1906)

14 वर्षों तक विदेशों में रहने के बाद 1893 में 21 वर्ष की आयु में अरबिंदो अपनी मातृभूमि भारत लौटे। जैसे ही उन्होंने मुंबई के अपोलो बंदरगाह पर अपने कदम रखे, उनके पूरे शरीर में एक अत्यंत गहरी, शांत और अलौकिक आध्यात्मिक अनुभूति (Spiritual Calm) दौड़ गई। उन्हें लगा मानो भारत माता ने अपने खोए हुए बेटे को अपनी गोद में समेट लिया हो।

भारत लौटकर उन्होंने बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ की रियासत में सेवा शुरू की। वे बड़ौदा कॉलेज में अंग्रेजी और फ्रेंच के प्रोफेसर बने और बाद में वाइस-प्रिंसिपल के पद तक पहुंचे।

अपनी जड़ों की ओर लौटना: संस्कृत और योग का अध्ययन

जो व्यक्ति इंग्लैंड में पला-बढ़ा था, उसने बड़ौदा में रहकर अपनी मातृभाषा बांग्ला, मराठी और देवभाषा संस्कृत का गहन अध्ययन किया। उन्होंने महर्षि वेदव्यास की महाभारत, वाल्मीकि रामायण, उपनिषदों और ऋग्वेद की ऋचाओं का मूल संस्कृत में मंथन किया। इसी दौरान उन्होंने प्राणायाम और प्राचीन भारतीय हठयोग का अभ्यास भी शुरू किया। 1901 में उनका विवाह मृणालिनी देवी के साथ संपन्न हुआ।

क्रांतिकारी आंदोलन के प्रखर नेता: ब्रिटिश हुकूमत की नींद उड़ाई

1905 में जब लॉर्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन (Partition of Bengal) का कुचक्र रचा, तो पूरे भारत में आक्रोश की ज्वाला भड़क उठी। श्री अरबिंदो बड़ौदा की आरामदायक और सुरक्षित नौकरी छोड़कर सीधे कोलकाता के रणक्षेत्र में कूद पड़े।

वे नेशनल कॉलेज (कोलकाता) के पहले प्रिंसिपल बने और स्वतंत्रता संग्राम के सबसे आक्रामक नेता के रूप में उभरे:

  • ‘वंदे मातरम्’ अखबार: उन्होंने बिपिन चंद्र पाल के साथ मिलकर अंग्रेजी दैनिक ‘वंदे मातरम्’ का संपादन शुरू किया। उनके संपादकीय लेखों में ऐसी प्रचंड वैचारिक आग होती थी कि देश के लाखों नौजवान हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूलने को तैयार हो गए।
  • पूर्ण स्वराज की पहली मांग: उस दौर में जब कांग्रेस केवल अंग्रेजों से रियायतें और प्रार्थनाएं मांगती थी, श्री अरबिंदो ने खुलेआम घोषणा की कि — “हमारा लक्ष्य केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि भारत की पूर्ण स्वाधीनता (पूर्ण स्वराज) है।”
  • गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियां: अपने छोटे भाई बारींद्र कुमार घोष और बाघा जतिन के साथ मिलकर उन्होंने ‘अनुशीलन समिति’ और ‘युगांतर’ जैसी गुप्त क्रांतिकारी संस्थाओं का मार्गदर्शन किया, जहाँ युवाओं को बम बनाने और हथियारों का प्रशिक्षण दिया जाता था।

अलीपुर जेल की कालकोठरी: क्रांतिकारी से योगी बनने का महा-मोड़

1908 में मुजफ्फरपुर में खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी द्वारा किए गए बम विस्फोट के बाद ब्रिटिश पुलिस ने श्री अरबिंदो को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया। इसे इतिहास में ‘अलीपुर बम केस’ (Alipore Bomb Case) कहा जाता है।

अंग्रेज सरकार उन्हें किसी भी तरह फांसी पर लटकाना चाहती थी। उन्हें कोलकाता की अलीपुर जेल की एक अत्यंत गंदी, अंधेरी और एकांत 9×6 फीट की कालकोठरी में बंद कर दिया गया। एक साल की यह जेल यात्रा श्री अरबिंदो के जीवन का सबसे बड़ा आध्यात्मिक मोड़ साबित हुई।

जेल में साक्षात ‘वासुदेव दर्शन’ का अलौकिक अनुभव

जेल की उस तंग कोठरी में श्री अरबिंदो ने हाथ में भगवद्गीता ली और ध्यान लगाना शुरू किया। वे कई-कई घंटे समाधि में लीन रहने लगे। इस दौरान स्वामी विवेकानंद की सूक्ष्म आत्मा ने उन्हें पंद्रह दिनों तक निरंतर उच्चतर आध्यात्मिक क्षेत्रों का मार्गदर्शन किया।

कुछ ही महीनों में उनके भीतर अद्वैत चेतना का ऐसा प्रचंड विस्फोट हुआ जिसे उन्होंने ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (वासुदेव दर्शन) कहा:

“जब मैं आंखें खोलकर देखता, तो मुझे जेल की काली पत्थर की दीवारें नहीं दिखती थीं; मुझे लगता था कि साक्षात भगवान वासुदेव (श्री कृष्ण) ने मुझे अपनी बाहों में घेर रखा है। जिस पेड़ की छांव में मैं टहलता था, वह पेड़ नहीं साक्षात श्री कृष्ण थे। जेल के लोहे के सीखचे, जेलर, मुझे गाली देने वाले सिपाही और यहां तक कि मुकद्दमे में मेरे खिलाफ फांसी की मांग करने वाला अंग्रेज मजिस्ट्रेट और सरकारी वकील — मुझे हर किसी के चेहरे पर केवल मुस्कुराते हुए भगवान श्री कृष्ण ही दिखाई देते थे!”

भगवान श्री कृष्ण ने जेल में उन्हें स्पष्ट आदेश दिया:

“मैंने तुम्हें इस जेल में किसी सजा के लिए नहीं, बल्कि अपने एकांत मिलन के लिए बुलाया था। तुम्हारा राजनीतिक कार्य अब समाप्त हो चुका है। अब तुम्हें इससे भी बड़ा एक कार्य करना है — पूरी मानव जाति की चेतना को बदलना और सनातन धर्म का वैश्विक पुनरुत्थान करना!”

चित्तरंजन दास की ऐतिहासिक बहस और बाइज्जत बरी

अदालत में श्री अरबिंदो की पैरवी उनके मित्र और प्रख्यात वकील देशबंधु चित्तरंजन दास (C.R. Das) ने की। चित्तरंजन दास ने अदालत में जजों के सामने वह अमर भाषण दिया जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया:

“इस कटघरे में जो व्यक्ति खड़ा है, वह केवल एक आरोपी नहीं है। वह देशभक्ति का कवि, राष्ट्रवाद का पैगंबर और मानवता का प्रेमी है। उसके शब्द केवल भारत में ही नहीं, बल्कि समुद्र पार सुदूर देशों में भी सुने जाएंगे। जब यह विवाद और यह अदालत इतिहास के गर्त में समा जाएगी, तब भी यह व्यक्ति अमर रहेगा!”

मई 1909 में सबूतों के अभाव में ब्रिटिश अदालत को श्री अरबिंदो को ससम्मान बाइज्जत बरी करना पड़ा।

उत्तरपाड़ा भाषण और पांडिचेरी प्रस्थान

जेल से बाहर आते ही श्री अरबिंदो ने पश्चिम बंगाल के उत्तरपाड़ा में अपना विश्व-प्रसिद्ध भाषण दिया, जिसे ‘उत्तरपाड़ा भाषण’ (Uttarpara Speech) कहा जाता है। उन्होंने लाखों की भीड़ के सामने घोषणा की:

“जब लोग मुझसे पूछते हैं कि राष्ट्रवाद क्या है, तो मैं कहता हूँ कि — सनातन धर्म ही हमारा राष्ट्रवाद है! यह सनातन राष्ट्र इसलिए नहीं उठा है कि वह दूसरों पर जुल्म करे, बल्कि इसलिए उठा है ताकि वह पूरी दुनिया को आध्यात्मिक प्रकाश दे सके।”

1910 में जब अंग्रेजों ने उन्हें दोबारा गिरफ्तार करने की साजिश रची, तो उन्हें अपनी अंतरात्मा से भगवान का आदेश मिला कि वे तुरंत बंगाल छोड़ दें। वे चुपचाप एक गुप्त नाव से चंद्रनगर होते हुए दक्षिण भारत में फ्रेंच शासन के अधीन पांडिचेरी (Pondicherry) चले गए। राजनीति को हमेशा के लिए पीछे छोड़कर वे पूर्णतः साधना में लीन हो गए।

पूर्ण योग (इंटीग्रल योग): मानव जाति का अगला कदम

पांडिचेरी में 40 वर्षों की कठोर साधना के बाद श्री अरबिंदो ने जिस आध्यात्मिक दर्शन को विकसित किया, उसे ‘पूर्ण योग’ (Integral Yoga) कहा जाता है।

पुराने योग और पूर्ण योग में क्या अंतर है?

  • पारंपरिक योग: हठयोग, ज्ञानयोग या भक्तियोग मनुष्य को संसार के दुखों और पुनर्जन्म से मुक्त कराकर समाधि या ‘मोक्ष’ दिलाने की बात करते हैं। उनका लक्ष्य संसार को छोड़कर परमात्मा में लीन हो जाना है।
  • श्री अरबिंदो का पूर्ण योग: श्री अरबिंदो कहते हैं कि संसार कोई पाप या मिथ्या नहीं है, यह तो ईश्वर की ही एक दिव्य लीला है। योग का उद्देश्य संसार से भागना नहीं, बल्कि परमात्मा की शक्ति को इसी भौतिक शरीर, मन और पृथ्वी पर उतारना है।

‘अतिमानस’ (The Supermind) का सिद्धांत

श्री अरबिंदो ने डार्विन के विकासवाद को आध्यात्मिक दृष्टि से समझाया। वे कहते हैं:

  1. पहले जड़ पदार्थ (Matter / पत्थर, मिट्टी) था।
  2. जड़ पदार्थ से प्राण (Life / पेड़-पौधे, पशु) का विकास हुआ।
  3. प्राण से मन (Mind / मनुष्य) का विकास हुआ।
  4. लेकिन मनुष्य विकास की अंतिम सीढ़ी नहीं है! जैसे पशु से मनुष्य बना, वैसे ही मनुष्य के आगे एक ‘दिव्य मानव’ (Superman / Gnostic Being) का जन्म होना निश्चित है।
  5. यह नया विकास ‘अतिमानस’ (Supermind) के अवतरण से होगा, जहाँ अज्ञान, रोग, दुख और मृत्यु की सीमाओं को पार किया जा सकेगा।

‘द मदर’ (मीरा अल्फासा) और श्री अरबिंदो आश्रम

1914 में फ्रांस की एक असाधारण आध्यात्मिक साधिका मीरा अल्फासा (Mirra Alfassa) पांडिचेरी पहुंचीं। जब वे पहली बार श्री अरबिंदो से मिलीं, तो उन्होंने तुरंत पहचान लिया कि यही वे गुरु हैं जिनका वे वर्षों से ध्यान में अनुभव कर रही थीं। श्री अरबिंदो ने भी उन्हें साक्षात ‘आद्यशक्ति’ (The Divine Mother) के रूप में स्वीकार किया।

1926 के 24 नवंबर (सिद्धि दिवस) को जब श्री अरबिंदो को अपनी साधना में अतिमानसिक चेतना की सिद्धि प्राप्त हुई, तो वे पूरी तरह एकांत में चले गए। उन्होंने पांडिचेरी में स्थापित ‘श्री अरबिंदो आश्रम’ के संचालन, शिष्यों के मार्गदर्शन और बाहरी गतिविधियों की पूरी बागडोर ‘माता जी’ (The Mother) के हाथों में सौंप दी।

ऑरोविल (Auroville): सार्वभौमिक नगर की स्थापना

माता जी ने श्री अरबिंदो के विज़न को साकार करने के लिए 1968 में पांडिचेरी के पास ‘ऑरोविल’ (Auroville – The City of Dawn) की स्थापना की। आज यह एक ऐसा अनूठा अंतरराष्ट्रीय नगर है जहाँ 50 से अधिक देशों के लोग बिना किसी धर्म, जाति, राष्ट्रीयता या राजनीति के एक साथ रहते हैं और आत्मिक प्रगति के लिए कार्य करते हैं। इसके केंद्र में स्थित स्वर्ण-गुंबद वाला ‘मातृमंदिर’ (Matrimandir) मौन ध्यान का वैश्विक केंद्र है।

श्री अरबिंदो का कालजयी साहित्य (Master Table)

श्री अरबिंदो केवल एक योगी नहीं, बल्कि अंग्रेजी भाषा के सर्वोच्च साहित्यकारों और कवियों में गिने जाते हैं:

महान ग्रंथ का नाम साहित्यिक स्वरूप मुख्य दार्शनिक विषय एवं संदेश
१. सावित्री (Savitri) महाकाव्य (Epic Poem) — 24,000 पंक्तियां अंग्रेजी का सबसे बड़ा आध्यात्मिक महाकाव्य। महाभारत की सत्यवान-सावित्री कथा के माध्यम से अज्ञान और मृत्यु पर चेतना की अंतिम विजय का रहस्य।
२. द लाइफ डिवाइन (The Life Divine) दार्शनिक ग्रंथ (Masterpiece) मानव जीवन के आध्यात्मिक उद्देश्य, विकासवाद और पृथ्वी पर दिव्य जीवन की स्थापना का संपूर्ण तात्विक विश्लेषण।
३. द सिंथेसिस ऑफ योग योग-शास्त्र कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और पूर्ण योग का वैज्ञानिक और व्यावहारिक समन्वय।
४. एसेज़ ऑन द गीता (Essays on the Gita) भाष्य एवं टीका भगवद्गीता के संदेश का आधुनिक मनुष्य के जीवन और कर्म के संदर्भ में अत्यंत व्यावहारिक और ओजस्वी निरूपण।

१९५० में महाप्रयाण और पावन समाधि

5 दिसंबर 1950 को 78 वर्ष की आयु में श्री अरबिंदो ने अपने भौतिक शरीर का त्याग किया। लेकिन मृत्यु के बाद भी एक ऐसा चमत्कार हुआ जिसने डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया।

सामान्यतः मृत्यु के कुछ ही घंटों बाद मानव शरीर में सड़ांध और क्षय शुरू हो जाता है। लेकिन श्री अरबिंदो के पार्थिव शरीर से लगातार 4 दिनों (111 घंटों) तक एक अत्यंत दिव्य प्रकाश, आभा और चंदन जैसी सुगंध निकलती रही। उनका शरीर बिल्कुल वैसा ही तरोताजा और कांतिमान था मानो वे गहरी समाधि में सो रहे हों। 9 दिसंबर को जब वह प्रकाश धीरे-धीरे विलीन हुआ, तब उनके पवित्र शरीर को आश्रम के प्रांगण में एक सफेद संगमरमर की समाधि में ससम्मान प्रतिष्ठित किया गया।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

१. श्री अरबिंदो का जन्म कब हुआ था और उनका प्रारंभिक जीवन कैसा था?

श्री अरबिंदो का जन्म 15 अगस्त 1872 को कोलकाता में हुआ था। उनके पिता डॉ. कृष्णधन घोष एक प्रख्यात डॉक्टर थे। मात्र 7 वर्ष की आयु में उन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया, जहाँ उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के किंग्स कॉलेज से उच्च शिक्षा और शास्त्रीय भाषाओं में महारत हासिल की थी।

२. अलीपुर जेल में श्री अरबिंदो को कौन सा आध्यात्मिक अनुभव हुआ था?

1908 में अलीपुर बम केस के दौरान जेल की कालकोठरी में साधना करते हुए उन्हें साक्षात भगवान श्री कृष्ण के ‘वासुदेव दर्शन’ हुए। उन्हें जेल की दीवारों, सीखचों, जेलर और मजिस्ट्रेट सहित हर प्राणी में केवल श्री कृष्ण दिखाई दिए, जिसने उनके जीवन को राजनीति से अध्यात्म की ओर मोड़ दिया।

३. श्री अरबिंदो के ‘पूर्ण योग’ (Integral Yoga) की मुख्य विशेषता क्या है?

पूर्ण योग का उद्देश्य संसार से भागकर केवल मोक्ष पाना नहीं है, बल्कि ‘अतिमानसिक चेतना’ (Supermind) को इस पृथ्वी पर, भौतिक शरीर और दैनिक जीवन में उतारकर मानव जीवन का संपूर्ण दिव्य रूपांतरण करना है। उनका मूल सूत्र है: “समस्त जीवन ही योग है” (All life is Yoga)।

४. श्री अरबिंदो और ‘द मदर’ (माता जी) का क्या संबंध था?

फ्रांस की मीरा अल्फासा (The Mother) श्री अरबिंदो की प्रमुख आध्यात्मिक सहयोगी और शक्ति-स्वरूपा थीं। 1926 में जब श्री अरबिंदो एकांत साधना में गए, तो उन्होंने श्री अरबिंदो आश्रम और बाद में अंतरराष्ट्रीय नगर ‘ऑरोविल’ के संचालन का पूरा दायित्व माता जी को सौंपा था।

५. महाकाव्य ‘सावित्री’ क्यों इतना प्रसिद्ध है?

‘सावित्री’ अंग्रेजी भाषा में रचा गया लगभग 24,000 पंक्तियों का विश्व का सबसे विशाल आध्यात्मिक महाकाव्य है। इसमें श्री अरबिंदो ने अपने गहन आंतरिक आध्यात्मिक अनुभवों और मृत्यु पर अमर चेतना की विजय की गाथा को अद्भुत काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया है।

निष्कर्ष: भविष्य की मानवता के प्रकाश-स्तंभ

श्री अरबिंदो का जीवन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि एक सच्चा देशभक्त केवल अपनी सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पूरी मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने भारत को केवल अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराने का स्वप्न नहीं देखा, बल्कि उन्होंने इंसान को उसके अज्ञान, मृत्यु और संकीर्णताओं से मुक्त कराने का महा-मार्ग दिखाया।

आज जब दुनिया युद्ध, आणविक हथियारों की होड़ और मानसिक तनाव के दौर से गुजर रही है, श्री अरबिंदो का यह विश्वास हमें नई आशा देता है कि — “अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, प्रकाश की विजय निश्चित है; और मानव जाति का भविष्य पतन में नहीं, बल्कि एक दिव्य अतिमानसिक जीवन के उदय में है।”

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