परिचय: त्रैलंग स्वामी — काशी के चलते-फिरते साक्षात शिव
यदि आप 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में काशी (वाराणसी) के मणिकर्णिका, अस्सी या पंचगंगा घाट पर सुबह-सुबह टहल रहे होते, तो आपको एक ऐसा अलौकिक दृश्य दिखाई देता जिसे देखकर आपकी आँखें फटी की फटी रह जातीं।
गंगा की लहरों पर पद्मासन लगाए एक विशालकाय, लगभग 300 पाउंड (140 किलो) वजनी संन्यासी ऐसे तैर रहा होता मानो पानी का नहीं, फूलों का गद्देदार बिस्तर हो! उनके शरीर पर एक धागा तक नहीं होता था (वे पूर्ण दिगंबर अवधूत थे), चेहरे पर किसी मासूम नवजात शिशु जैसी निश्चल मुस्कान होती थी, और आँखों में ऐसा अथाह तेज था कि कोई भी व्यक्ति उनसे आँखें नहीं मिला पाता था।
यह कोई और नहीं, बल्कि काशी के इतिहास के सबसे महान और अमर सिद्ध संत त्रैलंग स्वामी (Trailanga Swami) थे (1607–1887)। काशी के लोग उन्हें केवल एक साधु नहीं, बल्कि ‘काशी के सचल शिव’ (The Walking Shiva of Varanasi) मानते थे।
जब बंगाल के महान संत श्री रामकृष्ण परमहंस काशी आए और उन्होंने मणिकर्णिका घाट पर त्रैलंग स्वामी के दर्शन किए, तो वे भाव-समाधि में चले गए। परमहंस देव ने अपने शिष्यों से कहा था—“मैंने आज साक्षात काशी विश्वनाथ को मनुष्य शरीर में विचरण करते देखा है। त्रैलंग स्वामी में और भगवान शिव में रत्ती भर भी अंतर नहीं है। वे ज्ञान की उस पराकाष्ठा पर हैं जहाँ शरीर और संसार का कोई भान नहीं रह जाता।” आइए, इस अमर महायोगी के 280 वर्षों के जीवन, उनके चमत्कारों, हिमालयी तपस्या और उनकी अमर शिक्षाओं को सरल, बोलचाल की हिंदी में गहराई से समझें।
प्रारंभिक जीवन: 40 वर्ष की आयु में वैराग्य और श्मशान साधना
त्रैलंग स्वामी का जन्म वर्ष 1607 ईस्वी में वर्तमान आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम जिले के ‘होलिया’ गाँव में एक अत्यंत संपन्न और प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता श्री नृसिंह राव एक जमींदार थे और माता विद्यावती देवी भगवान शिव की परम भक्त थीं। उनके बचपन का नाम ‘शिवराम’ रखा गया था।
बचपन से ही शिवराम अन्य बालकों से बिल्कुल अलग थे। उन्हें खेल-कूद, धन-दौलत या सांसारिक सुखों में कोई रुचि नहीं थी। वे घंटों एकांत में बैठकर ध्यान में लीन रहते थे। उनके माता-पिता ने उनका विवाह कराने का बहुत प्रयास किया, लेकिन शिवराम ने स्पष्ट कह दिया कि उनका जीवन सांसारिक गृहस्थी के लिए नहीं, बल्कि केवल परमात्मा के साक्षात्कार के लिए है।
माता की मृत्यु और श्मशान में साधना
शिवराम अपनी माता से अत्यधिक स्नेह करते थे और उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक उनकी माता जीवित हैं, वे उनकी सेवा करेंगे। जब शिवराम की आयु लगभग 40 वर्ष की थी, तब उनकी माता का देहांत हो गया। माता के अंतिम संस्कार के बाद, शिवराम ने अपनी पैतृक संपत्ति अपने छोटे भाई को सौंप दी और उसी श्मशान घाट पर बैठकर कठोर तपस्या शुरू कर दी।
वे लगभग 20 वर्षों तक श्मशान में नग्न अवस्था में चिताओं की राख के बीच साधना में लीन रहे। इसके बाद वे संन्यास की खोज में निकले और पुष्कर (राजस्थान) में उनकी भेंट महान संन्यासी स्वामी भागीरथी स्वामी से हुई। भागीरथी स्वामी ने उन्हें विधिवत संन्यास की दीक्षा दी और उनका नाम रखा—‘स्वामी गणपति सरस्वती’। चूँकि वे तैलंग (आंध्र) प्रदेश से आए थे, इसलिए उत्तर भारत में लोग उन्हें आदर से ‘तैलंग स्वामी’ या ‘त्रैलंग स्वामी’ कहने लगे।
150 वर्षों की हिमालयी और मानसरोवर की घोर तपस्या
काशी आने से पहले त्रैलंग स्वामी का जीवन एक रहस्यमयी साधना का महासागर था। इतिहास और लोक-परंपरा के अनुसार, उन्होंने लगभग 150 वर्षों तक भारत के सबसे बीहड़ जंगलों और हिमालय की बर्फीली गुफाओं में तपस्या की।
वे रामेश्वरम से लेकर बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, और तिब्बत के कैलाश मानसरोवर तक घोर मौन में पैदल घूमे। जब वे हिमालय की कड़कड़ाती ठंड में (जहाँ तापमान शून्य से 20 डिग्री नीचे चला जाता था) ध्यान में बैठते, तो भी उनके शरीर पर कोई वस्त्र नहीं होता था। उनकी आंतरिक प्राण-ऊर्जा (तुम्मो) इतनी प्रबल थी कि बर्फ उनके शरीर के पास आते ही पिघल जाती थी।
प्रयागराज (इलाहाबाद) और नर्मदा के जंगलों में कई दशकों तक मौन रहने के बाद, लगभग 1737 ईस्वी के आसपास वे भगवान शिव की राजधानी काशी (वाराणसी) पहुँचे। और इसके बाद के अगले 150 वर्ष उन्होंने काशी के घाटों पर ही बिताए।
त्रैलंग स्वामी के अलौकिक संस्मरण: जब विज्ञान नतमस्तक हो गया
त्रैलंग स्वामी कभी किसी से कुछ नहीं माँगते थे और न ही किसी से बोलते थे। वे पूर्ण मौनी थे। लेकिन काशी के इतिहास में उनके ऐसे कई अलौकिक संस्मरण दर्ज हैं जिन्होंने उस समय के ब्रिटिश डॉक्टरों और अधिकारियों को भी घुटनों पर ला दिया था:
1. चूने का तीखा घोल (जहर) पीना और अंग्रेज मजिस्ट्रेट का चमत्कार
19वीं शताब्दी में जब अंग्रेजों का शासन था, तो काशी के एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने देखा कि एक विशालकाय संन्यासी पूरे शहर और घाटों पर बिना कपड़ों (नग्न) के घूमता है। अंग्रेज मजिस्ट्रेट को यह अपनी तथाकथित ‘सभ्यता’ के विरुद्ध लगा। उसने पुलिस को आदेश देकर त्रैलंग स्वामी को गिरफ्तार करवा दिया और जेल की काल-कोठरी में बंद करवाकर भारी ताला लगवा दिया।
कुछ ही मिनटों बाद सिपाहियों ने देखा कि त्रैलंग स्वामी जेल की छत पर आराम से टहल रहे हैं, जबकि कोठरी का ताला वैसे का वैसा बंद था! मजिस्ट्रेट ने दोबारा उन्हें बंद करवाया और पहरा सख्त कर दिया। लेकिन स्वामी जी फिर से जेल के बाहर निकल आए।
जहर पीने की परीक्षा
मजिस्ट्रेट को संदेह हुआ कि यह कोई जादुई चालबाजी है। उसने स्वामी जी की परीक्षा लेने के लिए एक बाल्टी में सफेद चूने का अत्यंत तीखा और विषैला घोल (Quicklime solution) तैयार करवाया और स्वामी जी के सामने रखकर कहा—“यदि तुम सचमुच सिद्ध महात्मा हो, तो इसे पीकर दिखाओ!”
त्रैलंग स्वामी मुस्कुराए। उन्होंने बिना एक पल गंवाए वह पूरी बाल्टी चूने का घोल ऐसे गटक लिया मानो कोई मीठा दूध पी रहे हों! उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आई।
लेकिन इसके कुछ ही मिनटों बाद, उस अंग्रेज मजिस्ट्रेट के पेट में अचानक भयानक जलन और दर्द शुरू हो गया! मजिस्ट्रेट दर्द से तड़पते हुए जमीन पर लोटने लगा और खून की उल्टियाँ करने लगा। तब उसे अपनी भयानक भूल का अहसास हुआ कि उसने एक ब्रह्मज्ञानी संत का अपमान किया है। मजिस्ट्रेट रोते हुए स्वामी जी के चरणों में गिर पड़ा। दयालु स्वामी जी ने उसके सिर पर हाथ फेरा और मजिस्ट्रेट का दर्द उसी क्षण गायब हो गया। इसके बाद अंग्रेज सरकार ने आदेश जारी कर दिया कि त्रैलंग स्वामी पर कोई भी कानून या रोक-टोक लागू नहीं होगी।
2. गंगा जी के जल पर पद्मासन में तैरना (जल-समाधि)
काशी के घाटों पर स्नान करने वाले हज़ारों लोगों ने कई बार देखा कि त्रैलंग स्वामी गंगा की प्रचंड धारा के बीच पद्मासन लगाकर पानी की सतह पर घंटों स्थिर बैठे रहते थे—मानो उनका शरीर लकड़ी या हवा की तरह हल्का हो गया हो।
कई बार वे गंगा के गहरे पानी के भीतर डुबकी लगाते और लगातार 7 से 15 दिनों तक पानी के भीतर ही समाधिस्थ रहते थे। जब स्थानीय मल्लाह और श्रद्धालु चिंतित होकर नाव लेकर खोजते, तो वे अचानक किसी दूसरे घाट पर मुस्कुराते हुए पानी से बाहर निकलते दिखाई देते थे।
3. अद्वैत का जीवंत प्रमाण: मिट्टी और विष्ठा खाना
एक बार एक ढोंगी पंडित ने त्रैलंग स्वामी का उपहास उड़ाने के लिए कहा—“तुम तो अद्वैत की बात करते हो कि सब कुछ ब्रह्म है। तो क्या तुम इस विष्ठा (गंदगी) को खा सकते हो?”
त्रैलंग स्वामी ने तनिक भी संकोच नहीं किया। उन्होंने जमीन से वह गंदगी उठाई और मुँह में डाल ली। जब पंडित ने घबराकर देखा, तो स्वामी जी के मुँह से और उनके हाथों से अत्यंत दिव्य सुगंधित गुलाब और चंदन की महक आ रही थी और वह गंदगी मीठे हलवे में बदल चुकी थी! पंडित लज्जित होकर उनके पैरों पर गिर पड़ा। स्वामी जी ने सिद्ध कर दिया था कि जिसकी दृष्टि में परमात्मा के सिवा कुछ और है ही नहीं, उसके लिए न कुछ अशुद्ध है और न ही कुछ विषैला।
लाहिड़ी महाशय और त्रैलंग स्वामी का दिव्य संबंध
काशी में उस समय दो महासूर्य एक साथ चमक रहे थे—एक थे संन्यासियों के मुकुटमणि त्रैलंग स्वामी, और दूसरे थे गृहस्थों के शिरोमणि लाहिड़ी महाशय।
यद्यपि त्रैलंग स्वामी किसी भी सामान्य व्यक्ति से नहीं मिलते थे और न ही किसी को देखकर उठते थे, लेकिन जब भी लाहिड़ी महाशय उनके पास से गुजरते, तो 300 पाउंड का वह विशाल संत तुरंत आदरपूर्वक उठकर खड़ा हो जाता और लाहिड़ी महाशय को गले लगा लेता था।
जब त्रैलंग स्वामी के शिष्यों ने एक बार पूछा कि महाराज, आप एक सामान्य गृहस्थ और सरकारी क्लर्क को इतना मान क्यों देते हैं, तो त्रैलंग स्वामी ने अपनी मौन भाषा में रेत पर लिखकर उत्तर दिया था:
“मैं तो लंगोटी पहनकर, दुनिया के सारे बंधन छोड़कर संन्यासी बना हूँ। लेकिन श्यामचरण ने धोती-कुर्ता पहनकर, पत्नी और बच्चों के बीच रहते हुए और सरकारी नौकरी करते हुए वह सर्वोच्च ब्रह्म-पद प्राप्त कर लिया है जो बड़े-बड़े संन्यासियों के लिए भी दुर्लभ है। काशी में असली शिव तो केदारघाट पर श्यामचरण के रूप में बैठे हैं।”
‘महावाक्य रत्नावली’: मौन योगी के अमर उपदेश
त्रैलंग स्वामी कभी प्रवचन या भाषण नहीं देते थे। वे लगभग सदा मौन रहते थे। लेकिन जब उनके एक परम भक्त और शिष्य उमाचरण मुखोपाध्याय ने उनसे आत्म-कल्याण के लिए उपदेश देने की प्रार्थना की, तो स्वामी जी ने उँगलियों से रेत पर और स्लेट पर संस्कृत में कुछ सूत्र लिखे। इन सूत्रों के संग्रह को ‘महावाक्य रत्नावली’ कहा जाता है।
त्रैलंग स्वामी के 5 प्रमुख आध्यात्मिक सूत्र
- संसार में सबसे बड़ा शत्रु कौन है? मनुष्य का अपना ही अनियंत्रित मन और उसकी अनगिनत वासनाएँ। जिसने मन को जीत लिया, उसने पूरी सृष्टि को जीत लिया।
- सच्चा संन्यासी कौन है? संन्यासी वह नहीं है जो गेरुए वस्त्र पहनता है; सच्चा संन्यासी वह है जिसके मन में किसी वस्तु के प्रति न तो राग (आसक्ति) है और न ही द्वेष (घृणा)।
- ईश्वर का साक्षात्कार कैसे हो? जब तक तुम्हारे भीतर ‘मैं’ और ‘मेरा’ (अहंकार) रहेगा, तब तक ईश्वर तुमसे दूर रहेगा। जैसे ही अहंकार विसर्जित होगा, तुम स्वयं ईश्वर स्वरूप हो जाओगे।
- मौन का महत्व: व्यर्थ बोलने से आंतरिक प्राण-शक्ति नष्ट होती है। प्रतिदिन कुछ समय पूर्ण मौन रहकर अपनी श्वास और अंतरात्मा का निरीक्षण करो।
- सत्य ही सर्वोच्च तपस्या है: सभी धर्मों, कर्मकांडों और तीर्थों का सार केवल एक है—सत्य के मार्ग पर अडिग रहना।
पंचगंगा घाट का मठ और विशाल शिवलिंग की स्थापना
जीवन के अंतिम वर्षों में त्रैलंग स्वामी काशी के प्रसिद्ध पंचगंगा घाट पर स्थित एक मकान में रहने लगे, जिसे आज ‘त्रैलंग स्वामी मठ’ कहा जाता है।
यहाँ उन्होंने एक और विस्मयकारी कार्य किया। एक दिन वे अकेले गंगा में उतरे और गंगा की तलहटी से कई टन भारी, एक विशालकाय काले पत्थर का शिवलिंग अपने दोनों हाथों पर उठाकर बाहर ले आए! उस शिवलिंग का वजन इतना अधिक था कि उसे उठाने के लिए कम से कम 20-25 बलवान पुरुषों की आवश्यकता होती। लेकिन स्वामी जी ने उसे अकेले उठाकर पंचगंगा घाट के अपने आश्रम में स्थापित किया।
यह दिव्य शिवलिंग आज भी पंचगंगा घाट स्थित त्रैलंग स्वामी मठ में प्रतिष्ठित है और देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु इस जाग्रत शिवलिंग के दर्शन करके अपनी मनोकामनाएं पूरी करते हैं।
महासमाधि (26 दिसंबर 1887) और जल-प्रवाह की पावन घटना
लगभग 280 वर्ष की अविश्वसनीय और सुदीर्घ आयु पूर्ण करने के बाद, त्रैलंग स्वामी ने अपनी महासमाधि का समय स्वयं घोषित किया।
26 दिसंबर 1887 (पौष शुक्ल एकादशी) के पावन दिन, उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया, उन्हें आशीर्वाद दिया और पद्मासन लगाकर अपनी संपूर्ण प्राण-ऊर्जा को सहस्रार चक्र में विलीन कर लिया। उनका शरीर समाधिस्थ हो गया।
स्वामी जी के पूर्व आदेशानुसार, उनके पार्थिव शरीर को जलाया नहीं गया; बल्कि एक भारी चंदन की लकड़ी की मंजूषा (संदूक) में उनके शरीर को पद्मासन अवस्था में बैठाकर, गंगा जी के पावन जल में ले जाया गया और मणिकर्णिका व पंचगंगा के बीच गंगा की अथाह गहराइयों में ‘जल-समाधि’ (जल-प्रवाह) दे दी गई।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्र. 1: क्या त्रैलंग स्वामी सचमुच 280 वर्ष तक जीवित रहे थे?
उत्तर: हाँ, ऐतिहासिक दस्तावेजों, ब्रिटिश समकालीन गजेटियरों, काशी के राजपरिवार के अभिलेखों और रामकृष्ण परमहंस व लाहिड़ी महाशय के संस्मरणों के अनुसार त्रैलंग स्वामी का जन्म 1607 में और महासमाधि 1887 में हुई थी। यह लगभग 280 वर्षों की अवधि बनती है। योग विज्ञान में ‘कायाकल्प’ और ‘प्राण-संयम’ द्वारा शरीर की कोशिकाओं के क्षय को रोककर ऐसी दीर्घायु प्राप्त करना संभव माना गया है।
प्र. 2: त्रैलंग स्वामी हमेशा नग्न (दिगंबर) क्यों रहते थे?
उत्तर: त्रैलंग स्वामी ‘परमहंस अवधूत’ की उस सर्वोच्च अवस्था में पहुँच चुके थे जहाँ मनुष्य देह-भाव (Body Consciousness) से पूरी तरह परे हो जाता है। उनके लिए वस्त्र पहनना या न पहनना एक समान था। वे बालक की तरह निर्दोष थे, जिसके मन में लज्जा, काम या सामाजिक दिखावे का कोई अस्तित्व नहीं होता।
प्र. 3: क्या आज भी काशी में त्रैलंग स्वामी का आश्रम देखा जा सकता है?
उत्तर: हाँ, वाराणसी के पंचगंगा घाट पर स्थित ‘त्रैलंग स्वामी मठ’ आज भी एक प्रमुख जाग्रत तीर्थ है। वहाँ स्वामी जी द्वारा स्थापित विशाल शिवलिंग, उनकी चरण-पादुकाएं और उनकी पवित्र धूनी आज भी सुरक्षित हैं।
प्र. 4: एक आधुनिक साधक त्रैलंग स्वामी के जीवन से क्या सीख सकता है?
उत्तर: सबसे बड़ी सीख है—‘सहनशीलता और निर्भयता’। जीवन में सुख आए या दुख, प्रशंसा मिले या अपमान, मनुष्य को गंगा की तरह शांत और अडिग रहना चाहिए। बाहरी दिखावे के बजाय अपने भीतर के सत्य को पहचानना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
निष्कर्ष: अद्वैत का सजीव अवतार
त्रैलंग स्वामी किसी पंथ, जाति या देश की सीमाओं में बंधे हुए संत नहीं थे; वे साक्षात अद्वैत वेदांत के जीवंत स्वरूप थे।
उनका जीवन हमें बताता है कि जब मनुष्य अपनी क्षुद्र वासनाओं और अहंकार को त्यागकर परमात्मा की अनंत चेतना में लीन हो जाता है, तो यह संपूर्ण प्रकृति उसकी दासी बन जाती है और मृत्यु भी उसके सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो जाती है।
काशी के सचल शिव परमहंस त्रैलंग स्वामी के पावन चरणों में कोटि-कोटि नमन । हर हर महादेव ।





