परिचय: महायोगी गुरु गोरखनाथ — हठयोग और सिद्ध परंपरा के अमर प्रवर्तक
भारतीय अध्यात्म और योग के हज़ारों साल पुराने इतिहास में यदि किसी एक महापुरुष ने योग को संस्कृत के कठिन श्लोकों, राजमहलों और संकीर्ण पंथों की चारदीवारी से निकालकर भारत के आम जनमानस, किसानों और झोपड़ियों तक पहुँचाया, तो वे थे—महायोगी गुरु गोरखनाथ (गोरक्षनाथ)।
उत्तर भारत और नेपाल के लोक-जीवन में सदियों से एक कहावत गूंजती रही है—“गोरख आया, जम थर्राया” (अर्थात जब गोरखनाथ जी का आगमन होता है, तो यमराज और काल भी भयभीत होकर पीछे हट जाते हैं)। संत कबीर दास, गुरु नानक देव, और संत ज्ञानेश्वर जैसे भारत के महान संतों ने गुरु गोरखनाथ को योग का सर्वोच्च ‘शिरोमणि’ माना है।
शास्त्रों और नाथ परंपरा में गुरु गोरखनाथ को साक्षात भगवान शिव (आदिनाथ) का अवतार माना जाता है। उन्होंने न केवल भारत में ‘हठयोग’ (Hatha Yoga) और ‘कायाकल्प विद्या’ को पुनर्जीवित किया, बल्कि समाज में फैले पाखंड, जातिवाद और आडंबरों पर कड़ा प्रहार करके एक ऐसी जाग्रत नाथ-परंपरा की नींव रखी जो आज भी हिमालय से लेकर कन्याकुमारी और नेपाल तक जीवित है। आइए, इस लेख में गुरु गोरखनाथ के अलौकिक जन्म, उनके गुरु मत्स्येंद्रनाथ को माया से छुड़ाने की कथा, हठयोग के वैज्ञानिक रहस्यों और उनकी अमर शिक्षाओं को सरल, बोलचाल की हिंदी में विस्तार से समझें।
गोरखनाथ जी का प्राकट्य: गोबर के ढेर से प्रकट हुआ दिव्य बालक
गुरु गोरखनाथ का जन्म किसी साधारण मनुष्य की तरह नहीं हुआ था; उनका प्राकट्य एक अत्यंत अलौकिक और विस्मयकारी घटना माना जाता है।
मत्स्येंद्रनाथ की भभूत और ब्राह्मणी का संदेह
कथा के अनुसार, एक बार नाथ संप्रदाय के आदि-गुरु मत्स्येंद्रनाथ (मछिंद्रनाथ) जी भ्रमण करते हुए एक गाँव में पहुँचे। वहाँ वे एक धार्मिक लेकिन अत्यंत दुखी ब्राह्मणी के घर भिक्षा माँगने गए। भिक्षा देते समय वह ब्राह्मणी फूट-फूटकर रोने लगी। जब मत्स्येंद्रनाथ जी ने उसके दुख का कारण पूछा, तो उसने बताया कि विवाह के कई वर्ष बीत जाने के बाद भी उसकी कोई संतान नहीं है और समाज उसे ‘बांझ’ कहकर ताने मारता है।
मत्स्येंद्रनाथ जी को उस पर दया आ गई। उन्होंने अपने झोले से एक चुटकी सिद्ध भभूत (राख) निकाली और उस स्त्री को देते हुए कहा—“माई! इस भभूत को भगवान शिव का स्मरण करके जल के साथ ग्रहण कर लेना। तेरे गर्भ से एक अत्यंत तेजस्वी, त्रिकालदर्शी और अमर पुत्र का जन्म होगा जो पूरी दुनिया में तेरा नाम रोशन करेगा।”
मत्स्येंद्रनाथ जी आगे की यात्रा पर निकल गए। लेकिन जब उस ब्राह्मणी ने अपनी पड़ोसिनों को यह बात बताई, तो वे हँसने लगीं और कहने लगीं—“तू पागल है क्या? भला कहीं राख खाने से भी बच्चे पैदा होते हैं? उस साधु ने ज़रूर कोई टोना-टोटका किया होगा। यदि तूने इसे खाया तो तू मर जाएगी।” पड़ोसियों के बहकावे में आकर उस भयभीत ब्राह्मणी ने वह सिद्ध भभूत चुपचाप घर के पीछे गोबर के गड्ढे (घूरे / खाद के ढेर) में फेंक दी।
12 वर्ष बाद जब गुरु लौटे
ठीक 12 वर्ष बीत गए। मत्स्येंद्रनाथ जी अपनी हिमालयी साधना पूरी करके उसी गाँव से दोबारा गुजरे। वे सीधे उस ब्राह्मणी के द्वार पर पहुँचे और आवाज़ लगाई—“माई! वह 12 वर्ष का बालक कहाँ है जिसे मैंने तुझे दिया था?”
ब्राह्मणी कांपने लगी। उसने रोते हुए हाथ जोड़कर अपनी गलती स्वीकार कर ली और बताया कि पड़ोसियों के डर से उसने वह भभूत घर के पीछे गोबर के गड्ढे में फेंक दी थी। मत्स्येंद्रनाथ जी तनिक भी क्रोधित नहीं हुए। वे शांत भाव से उस गोबर के ढेर के पास पहुँचे और उन्होंने तीव्र स्वर में पुकारा—“अलख निरंजन! हे बालक, बाहर आओ!”
उसी क्षण गोबर और राख के उस विशाल ढेर में से एक दिव्य प्रकाश चमका और भीतर से एक 12 वर्ष का अत्यंत सुंदर, तेजस्वी बालक ‘आदेश! आदेश!’ का उद्घोष करते हुए बाहर निकल आया! उस बालक के मुखमंडल पर करोड़ों सूर्यों का तेज था।
चूँकि उस बालक का प्राकट्य ‘गो’ (गाय के गोबर) और राख (रक्ष) के बीच सुरक्षित रहने से हुआ था, इसलिए मत्स्येंद्रनाथ जी ने उसका नाम रखा—‘गोरखनाथ’ (गोरक्षनाथ)। मत्स्येंद्रनाथ जी उस बालक को अपने साथ लेकर हिमालय चले गए और उन्हें योग की समस्त गुप्त विद्याओं में निष्णात किया।
“चेत मछंदर, गोरख आया”: जब शिष्य ने गुरु को माया से बचाया
गुरु-शिष्य परंपरा में हमेशा गुरु ही शिष्य को अज्ञान से बचाता है, लेकिन नाथ परंपरा में एक ऐसा अद्वितीय प्रसंग आता है जहाँ शिष्य गोरखनाथ ने अपने ही गुरु मत्स्येंद्रनाथ को घोर माया के बंधन से बाहर निकाला था।
कदली वन और स्त्री राज्य का मोहपाश
कथा के अनुसार, साधना के एक विशेष चरण में गुरु मत्स्येंद्रनाथ असम और बंगाल के पास स्थित ‘कदली वन’ (स्त्री राज्य) में पहुँचे। वहाँ की महारानी मैनावती और उनके राज्य में केवल स्त्रियाँ रहती थीं। रानी मैनावती मत्स्येंद्रनाथ के रूप और तेज पर मोहित हो गईं।
मत्स्येंद्रनाथ जी अपनी योग-माया के एक सूक्ष्म प्रारब्ध के कारण उस राजमहलों के विलास, संगीत और सांसारिक सुखों में उलझ गए। वे अपनी योग-साधना, सिद्ध पद और संसार को पूरी तरह भूल गए और राजा बनकर भोग-विलास में लिप्त हो गए। वर्षों बीत गए, मत्स्येंद्रनाथ की दाढ़ी-मूंछ सफेद हो गई और वे वृद्ध दिखने लगे।
गोरखनाथ का नट रूप और मृदंग की ध्वनि
जब हिमालय में ध्यान में बैठे गोरखनाथ जी को अपनी अंतर्दृष्टि से पता चला कि उनके पूज्य गुरुदेव काम और माया के गहरे जाल में फंसे हुए हैं, तो वे तुरंत अपने गुरु की रक्षा के लिए कदली वन की ओर दौड़े।
कदली वन के राजमहल में किसी भी पुरुष का प्रवेश वर्जित था। गोरखनाथ जी ने एक नट (कलाकार) का वेश बनाया और हाथ में एक मृदंग (पखावज/ढोलक) लेकर राजदरबार में पहुँचे जहाँ राजा बने मत्स्येंद्रनाथ भोग में डूबे हुए थे। गोरखनाथ जी ने मृदंग पर ऐसी अलौकिक थाप दी कि मृदंग से शब्दों की गूंज निकलने लगी:
“चेत मछंदर, गोरख आया! जाग मछंदर, गोरख आया!”
“जाग मछंदर गोरख आया! कोल बलंदै, जोगी सोवै, अकल गवाई काया! चेत मछंदर गोरख आया!”
अर्थात—हे गुरुदेव! जागिए, आपका शिष्य गोरखनाथ आ पहुँचा है। काल आपके सिर पर मंडरा रहा है और आप भोग में सो रहे हैं। अपनी खोई हुई योग-चेतना को पहचानिए!
मृदंग की उस आध्यात्मिक ध्वनि ने मत्स्येंद्रनाथ के अंतर्मन पर प्रहार किया। उनकी वर्षों की मोह-निद्रा टूट गई। उन्हें तुरंत अपनी वास्तविक सत्ता और सिद्ध स्वरूप का स्मरण हो आया। वे लज्जित होकर राजमहल और भोग को त्यागकर अपने प्रिय शिष्य गोरखनाथ के साथ तुरंत हिमालय की साधना में लौट आए। इतिहास में ऐसा शिष्य मिलना दुर्लभ है जिसने अपने गुरु के आध्यात्मिक मान की रक्षा के लिए काल से भी टक्कर ले ली।
हठयोग की उत्पत्ति और वैज्ञानिक सिद्धांत: ‘ह’ और ‘ठ’ का मिलन
आज पूरी दुनिया में ‘हठयोग’ (Hatha Yoga) का अभ्यास किया जाता है, लेकिन इसके वास्तविक जनक और वैज्ञानिक व्यवस्थापक गुरु गोरखनाथ ही थे। उन्होंने ‘गोरक्ष शतक’, ‘सिद्ध सिद्धांत पद्धति’ और ‘गोरक्ष संहिता’ जैसे महान ग्रंथों की रचना की।
हठयोग का शाब्दिक और सूक्ष्म अर्थ
हठयोग कोई जिद्द या शरीर को जबरदस्ती कष्ट देने का नाम नहीं है। ‘हठ’ दो बीजाक्षरों के मेल से बना है:
- ‘ह’ (Ha) = सूर्य नाड़ी (Pingala Nadi): जो हमारे शरीर की दाईं नासिका से प्रवाहित होती है। यह अग्नि, उष्णता, सक्रियता और शारीरिक प्राण का प्रतीक है।
- ‘ठ’ (Tha) = चंद्र नाड़ी (Ida Nadi): जो हमारे शरीर की बाईं नासिका से प्रवाहित होती है। यह शीतलता, शांति, मानसिक ऊर्जा और विश्राम का प्रतीक है।
‘योग’ का अर्थ है जोड़ना। अतः जब सूर्य और चंद्र नाड़ियों का प्रवाह संतुलित होकर मध्य मार्ग यानी ‘सुषुम्ना नाड़ी’ में प्रवेश करता है, तो कुंडलिनी शक्ति जागृत होती है। इसी अवस्था को ‘हठयोग’ कहा जाता है।
हठयोग के 6 अंग (षडंग योग) और षट्कर्म
पतंजलि ने अष्टांग योग दिया था, जबकि गोरखनाथ जी ने शरीर को पहले पूर्ण शुद्ध करने के लिए ‘षट्कर्म’ (नेति, धौति, बस्ती, नौलि, त्राटक, और कपालभाति) का विधान किया। गोरखनाथ जी का मानना था कि जब तक शरीर में कफ, वात और पित्त का संतुलन नहीं होगा और नस-नाड़ियां साफ नहीं होंगी, तब तक मन कभी शांत नहीं हो सकता।
कायाकल्प विद्या और ‘वज्र देह’ (Divya Deha) का रहस्य
गुरु गोरखनाथ केवल हठयोगी ही नहीं थे, बल्कि वे प्राचीन भारतीय ‘रस-शास्त्र’ (Alchemy / रस-विद्या) और कायाकल्प के सर्वोच्च आचार्य थे। उन्होंने सिद्ध किया कि योग और दिव्य औषधियों के प्रभाव से मानव शरीर को बुढ़ापे और मृत्यु के प्रभाव से मुक्त किया जा सकता है।
अल्लमा प्रभु और गोरखनाथ की तलवार परीक्षा
दक्षिण भारत के महान शिवशरण संत अल्लमा प्रभु और गुरु गोरखनाथ के बीच एक प्रसिद्ध संवाद का उल्लेख मिलता है।
गोरखनाथ जी को अपनी सिद्ध ‘वज्र काया’ पर गर्व था। उन्होंने अल्लमा प्रभु से कहा—“प्रभु! मेरी साधना की परीक्षा लो। यह तलवार लो और पूरी ताकत से मेरी देह पर वार करो।” अल्लमा प्रभु ने जब तलवार से गोरखनाथ जी के शरीर पर वार किया, तो तलवार पत्थर या लोहे से टकराने जैसी आवाज़ करती हुई खन-खन कर टूट गई, लेकिन गोरखनाथ के शरीर पर खरोंच तक नहीं आई!
इसके बाद अल्लमा प्रभु मुस्कुराए और बोले—“अब तुम अपनी तलवार से मेरे शरीर पर वार करो।” गोरखनाथ जी ने पूरी शक्ति से अल्लमा प्रभु पर तलवार चलाई। लेकिन तलवार बिना किसी अवरोध के अल्लमा प्रभु के शरीर के आर-पार निकल गई—जैसे हवा या आकाश में तलवार चलाई गई हो! वहाँ कोई भौतिक शरीर था ही नहीं, केवल शुद्ध निराकार चेतना थी।
गोरखनाथ जी समझ गए कि स्थूल शरीर को ‘वज्र’ बनाना एक महान सिद्धि है, लेकिन शरीर को चेतना में विलीन कर देना उससे भी उच्च अवस्था है। गोरखनाथ जी ने अल्लमा प्रभु को नमन किया और अपनी साधना को परा-भक्ति और शून्य-समाधि के सर्वोच्च स्तर पर पहुँचाया।
नाथ संप्रदाय के लक्षण: कानफाटा योगी, कुंडल और ‘अलख निरंजन’
गुरु गोरखनाथ द्वारा स्थापित नाथ संप्रदाय के संन्यासियों का स्वरूप अत्यंत अनूठा और प्रभावशाली होता है। समाज में उन्हें अक्सर ‘कानफाटा योगी’ (Kanphata Yogis) या ‘दर्शनी साधु’ कहा जाता है:
| प्रतीक / अंग | विवरण | आध्यात्मिक व वैज्ञानिक रहस्य |
|---|---|---|
| कान में कुंडल (दर्शनी) | कान के बीच की उपास्थि (cartilage) को चीरकर बड़े कुंडल पहनना। | कान के उस विशेष बिंदु को चीरने से काम-वासना की सूक्ष्म नसें शांत हो जाती हैं और ब्रह्मचर्य सहज हो जाता है। |
| नाद और सेली (सींगी) | काले धागे (सेली) में हिरण के सींग की छोटी सी सीटी (नाद)। | अनाहत नाद (ओंकार ध्वनि) का स्मरण; भोजन से पहले और पूजा में इसे बजाया जाता है। |
| भस्म (धूनी की राख) | पूरे शरीर पर अखंड धूनी की पवित्र राख का लेप। | नश्वरता का बोध और पहाड़ों की भीषण ठंड व कीट-पतंगों से त्वचा की प्राकृतिक सुरक्षा। |
| ‘अलख निरंजन’ और ‘आदेश’ | नाथ संन्यासियों का पारंपरिक अभिवादन। | ‘अलख’ = जो आँखों से न दिखे (अव्यक्त), ‘निरंजन’ = माया के अंजन से रहित (परमात्मा)। ‘आदेश’ = आदि ईश (भगवान शिव) को नमन। |
नेपाल से लेकर पेशावर तक: गोरखनाथ का विशाल साम्राज्य
गुरु गोरखनाथ का प्रभाव किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं था; उनका प्रभाव पूरे अखंड भारत और पड़ोसी देशों में फैला हुआ था:
1. नेपाल और ‘गोरखा’ वीरों की गाथा
नेपाल देश के इतिहास और संस्कृति की आत्मा में गुरु गोरखनाथ बसे हुए हैं। नेपाल के प्रसिद्ध और अदम्य साहसी सैनिक ‘गोरखा’ (Gurkhas) का नामकरण साक्षात गुरु गोरखनाथ के नाम पर हुआ है। गोरखा सैनिक युद्ध के मैदान में ‘जय गोरख’ का जयघोष करते हुए उतरते हैं। नेपाल के प्राचीन सिक्कों और शाही मुहरों पर गोरखनाथ जी की चरण-पादुकाओं का चित्र अंकित रहता था और गोरखा राजपरिवार उन्हें अपना कुल-गुरु मानता रहा है।
2. गोरखपुर का गोरखनाथ मंदिर और मकर संक्रांति की खिचड़ी
उत्तर प्रदेश का ‘गोरखपुर’ शहर गुरु गोरखनाथ की प्रधान तपोभूमि है। यहाँ स्थित भव्य गोरखनाथ मंदिर नाथ संप्रदाय का वैश्विक केंद्र है।
मान्यता है कि ज्वालाजी (हिमाचल) से भ्रमण करते हुए जब गोरखनाथ जी यहाँ आए, तो उन्होंने अपना खप्पर (भिक्षापात्र) रखा। लोगों ने उसमें कच्चा चावल और दाल डालना शुरू किया, लेकिन वह खप्पर भरता ही नहीं था। आज भी मकर संक्रांति के पावन पर्व पर लाखों श्रद्धालु दूर-दूर से आकर गोरखनाथ मंदिर में ‘खिचड़ी’ अर्पित करते हैं और यह विशाल खिचड़ी मेला महीने भर चलता है।
3. पेशावर (गोरख टीला, पाकिस्तान) और बलूचिस्तान
विभाजन से पहले पाकिस्तान के पेशावर में ‘गोरख टीला’ नाथ योगियों का एक अत्यंत विशाल और शक्तिशाली केंद्र था, जहाँ सम्राट अकबर भी गोरखनाथी संतों के दर्शन करने आया करता था। इसके अलावा बलूचिस्तान के हिंगलाज माता मंदिर में भी गोरखनाथ जी की तपस्या के प्रमाण मिलते हैं।
सामाजिक क्रांति: जाति-भेद और पाखंड का खंडन
मध्यकालीन भारत में जब समाज ऊंच-नीच, छुआछूत और थोथे पांडित्य के आडंबर में जकड़ा हुआ था, तब गुरु गोरखनाथ ने एक प्रचंड सामाजिक क्रांति की।
उन्होंने घोषणा की कि आत्म-साक्षात्कार पर किसी विशेष कुल या जाति का एकाधिकार नहीं है। जो भी व्यक्ति अपनी श्वास और चित्त को शुद्ध कर लेगा, वही सच्चा योगी है। गोरखनाथ जी ने जुलाहों, कुम्हारों, किसानों, पशुपालकों और तथाकथित अछूत वर्ग के लोगों को गले लगाया और उन्हें योग की सर्वोच्च दीक्षा देकर ‘सिद्ध’ बनाया।
उनकी वाणियों (गोरख-बानी) में संस्कृत के भारी-भरकम शब्दों के बजाय आम जनता की सधुक्कड़ी / लोक-भाषा का प्रयोग मिलता है:
“हबकि न बोलिबा, ठबकि न चलिबा, धीरे धरिबा पावं।
गरब न करिबा, सहजै रहिबा, भणंत गोरख रावं॥”
अर्थ: बिना विचारे उतावली में न बोलो, अहंकार में अकड़कर न चलो, हर कदम धैर्य से रखो। किसी सिद्धि या ज्ञान का घमंड मत करो, सहज और सरल होकर जीवन जियो—यही गोरखनाथ का संदेश है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्र. 1: क्या गुरु गोरखनाथ आज भी जीवित हैं?
उत्तर: नाथ परंपरा और हिमालयी सिद्ध मान्यता के अनुसार, गुरु गोरखनाथ ‘अमर सिद्ध’ (चिरायु) हैं। उन्होंने अपनी काया को पूर्णतः पारद और योग-शक्ति द्वारा ‘दिव्य देह’ में रूपांतरित कर लिया था। वे आज भी सूक्ष्म शरीर में हिमालय के गुप्त सिद्धाश्रम (ज्ञानगंज) और गिरी-कंदराओं में साधना में लीन हैं और सच्चे साधकों को आंतरिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
प्र. 2: कबीर दास जी और गोरखनाथ जी के बीच क्या संबंध था?
उत्तर: संत कबीर दास जी गुरु गोरखनाथ से अत्यंत प्रभावित थे। कबीर की उलटबासियों और योग-परक साखियों पर गोरखनाथी दर्शन की गहरी छाप है। प्राचीन लोक-परंपरा में कबीर और गोरखनाथ के बीच कई आध्यात्मिक संवादों और गोष्ठियों का वर्णन मिलता है, जहाँ दोनों संतों ने बाहरी पाखंडों का खंडन करते हुए केवल ‘सहज समाधि’ को सत्य बताया।
प्र. 3: नाथ योगियों में ‘आदेश’ कहने की परंपरा क्यों है?
उत्तर: नाथ संप्रदाय में जब दो साधु आपस में मिलते हैं, तो वे ‘नमस्ते’ या ‘प्रणाम’ के बजाय ‘आदेश’ (Aadesh) कहते हैं। ‘आदेश’ का अर्थ होता है—‘आदि-ईश’ (भगवान शिव) की आज्ञा और उनकी उपस्थिति को नमन करना। यह याद दिलाता है कि बोलने वाला और सुनने वाला दोनों उसी एक शिव-चेतना के अधीन हैं।
प्र. 4: एक आधुनिक गृहस्थ गुरु गोरखनाथ की शिक्षाओं से क्या लाभ उठा सकता है?
उत्तर: गोरखनाथ जी की सबसे बड़ी सीख है—‘संतुलन’ (Balance)। आधुनिक जीवन में तनाव, बीमारी और भटकाव से बचने के लिए हठयोग के सरल प्राणायाम, श्वास का नियमन, सात्विक आहार और ‘सहज भाव’ से अपने कर्तव्यों का पालन करना हर गृहस्थ के लिए अत्यंत लाभकारी है।
निष्कर्ष: अलख निरंजन का अमर संदेश
गुरु गोरखनाथ केवल एक ऐतिहासिक योगी नहीं हैं; वे सनातन भारत की उस अदम्य इच्छा-शक्ति के प्रतीक हैं जो प्रकृति के नियमों को भी परमात्मा के प्रेम में मोड़ सकती है।
उन्होंने हमें सिखाया कि ईश्वर को पाने के लिए संसार से भागने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि अपने शरीर और मन को इतना शुद्ध और शक्तिशाली बना लेना है कि इसी हाड़-मांस के शरीर के भीतर उस ‘अलख निरंजन’ (अदृश्य परमात्मा) का साक्षात्कार हो सके।
जय गुरु गोरखनाथ । आदेश ! आदेश ! आदेश !




