भारत की सिद्ध परंपरा में कुछ नाम ऐसे हैं जिनके आगे “संत” या “योगी” शब्द छोटा पड़ जाता है। गुरु गोरखनाथ ऐसा ही एक नाम है — जिन्हें परंपरा महायोगी कहती है, जिनके नाम पर एक पूरा शहर बसा, और जिनका स्थापित किया हुआ संप्रदाय आज भी जीवित है।
पर गोरखनाथ के साथ एक अनोखी कठिनाई भी है: उनके बारे में जितनी कथाएँ प्रचलित हैं, उतने ऐतिहासिक प्रमाण नहीं। इस लेख में हम दोनों को अलग-अलग रखकर देखेंगे — इतिहास क्या कहता है, और परंपरा क्या मानती है।
गोरखनाथ कौन थे?
गोरखनाथ (संस्कृत में गोरक्षनाथ) एक हिंदू योगी और महासिद्ध थे, जिन्होंने नाथ संप्रदाय नामक मठवासी परंपरा को स्थापित और व्यवस्थित किया। परंपरा उन्हें सिद्ध परंपरा के सबसे प्रभावशाली नामों में गिनती है, और नवनाथ — नौ नाथ सिद्धों — में से एक मानती है।
उनके अनुयायी आज भी कई नामों से जाने जाते हैं: जोगी, गोरखनाथी, दर्शनी, और कनफटा योगी — यह अंतिम नाम दीक्षा के समय कानों में पहनाई जाने वाली विशेष कुंडलों के कारण पड़ा।
वे कब हुए? इतिहासकार सहमत नहीं हैं
यह सबसे ईमानदार बात पहले कह देनी चाहिए — गोरखनाथ की जन्मतिथि या जन्मस्थान का कोई प्रामाणिक अभिलेख नहीं है।
इतिहासकार इतना अवश्य मानते हैं कि वे दूसरी सहस्राब्दी के पूर्वार्ध में हुए, पर शताब्दी पर मतभेद है:
- ब्रिग्स — 11वीं–12वीं शताब्दी
- एबट — 13वीं शताब्दी (बाबा फरीद से जुड़े दस्तावेज़ों और ज्ञानेश्वरी की पांडुलिपियों के आधार पर)
- ग्रियर्सन — 14वीं शताब्दी (गुजरात से मिले प्रमाणों के आधार पर)
दूसरी ओर परंपरा उन्हें काल से परे मानती है — कथाओं के अनुसार वे भिन्न-भिन्न युगों में प्रकट होते रहे हैं। यही कारण है कि महावतार बाबाजी या चिरंजीवियों की तरह गोरखनाथ की कथा भी “अमरत्व” के स्वर में कही जाती है।
गुरु मत्स्येंद्रनाथ और आदिनाथ की परंपरा
गोरखनाथ के गुरु थे मत्स्येंद्रनाथ, जो स्वयं नाथ परंपरा के आदि आचार्यों में गिने जाते हैं। परंपरा इस गुरु-शृंखला को इस क्रम में रखती है:
- आदिनाथ — जिन्हें भगवान शिव का ही रूप माना जाता है
- मत्स्येंद्रनाथ — गोरखनाथ के साक्षात् गुरु
- गोरखनाथ — जिन्होंने परंपरा को संगठित रूप दिया
गुरु-शिष्य की यह कथा भारतीय साहित्य में बहुत प्रसिद्ध है — विशेषकर वह प्रसंग जिसमें गोरखनाथ अपने गुरु को साधना-पथ पर लौटाकर लाते हैं। ध्यान रहे, ये वृत्तांत हागियोग्राफ़ी अर्थात भक्ति-साहित्य के हैं, इतिहास-लेखन के नहीं।
नाथ संप्रदाय क्या है?
एक भ्रम यहाँ दूर कर लेना चाहिए: नाथ परंपरा गोरखनाथ से पहले भी अस्तित्व में थी। गोरखनाथ ने उसे शून्य से नहीं बनाया — उन्होंने बिखरी हुई सिद्ध-धाराओं को एक संगठित मठ-व्यवस्था और स्पष्ट साधना-पद्धति दी। इसी कारण उन्हें इस आंदोलन का संस्थापक कहा जाता है।
नाथ संप्रदाय की पहचान बनी — जाति-व्यवस्था से दूरी, गृहस्थ और संन्यासी दोनों के लिए खुलापन, कर्मकांड के बजाय शरीर और प्राण की साधना पर बल, और लोकभाषा में शिक्षा। यही कारण है कि कबीर और गुरु नानक जैसे संतों की वाणी में भी गोरखनाथ और नाथ योगियों का उल्लेख मिलता है।
नवनाथ — नौ सिद्ध
नाथ परंपरा में नवनाथ यानी नौ प्रमुख नाथ सिद्धों की अवधारणा केंद्रीय है। गोरखनाथ इन्हीं नौ में से एक हैं। महाराष्ट्र और उत्तर भारत की लोक-परंपरा में नवनाथ की कथाएँ आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं, और इन पर स्वतंत्र ग्रंथ भी उपलब्ध हैं।
गोरखनाथ और हठयोग — यहाँ विद्वान बँटे हुए हैं
गोरखनाथ के नाम से कई महत्वपूर्ण ग्रंथ जुड़े हैं:
- गोरक्षशतक
- गोरक्ष संहिता
- सिद्ध सिद्धांत पद्धति — अद्वैत के आधार पर लिखा गया, हठयोग के प्राचीनतम ग्रंथों में गिना जाता है
- योगबीज
- योगचिंतामणि
अब विवाद यह है कि क्या हठयोग की उत्पत्ति वास्तव में नाथ योगियों से हुई। कई विद्वान इसे नाथ परंपरा से ही जोड़ते हैं। परंतु ब्रिटिश भारतविद् जेम्स मैलिन्सन इस संबंध को अस्वीकार करते हैं और हठयोग की जड़ें दशनामी संप्रदाय, दत्तात्रेय-परंपरा तथा रामानंदियों में देखते हैं। दूसरी ओर गाय बेक जैसे विद्वान कहते हैं कि गोरखनाथ, कनफटा योगियों और हठयोग का संबंध प्रश्न से परे है।
निष्कर्ष यह कि गोरखनाथ का हठयोग-साहित्य पर गहरा प्रभाव निर्विवाद है, पर “हठयोग के जनक” कहना अकादमिक दृष्टि से विवादित है।
शाबर मंत्रों की परंपरा
लोक-परंपरा में शाबर मंत्रों की रचना गोरखनाथ और अन्य नाथ सिद्धों से जोड़ी जाती है। इनकी विशेषता यह बताई जाती है कि ये संस्कृत में नहीं, बल्कि ब्रज, अवधी, राजस्थानी, भोजपुरी जैसी लोकभाषाओं में हैं — ताकि साधारण जन भी इन्हें समझ और उच्चार सकें।
यहाँ एक स्पष्ट चेतावनी आवश्यक है: शाबर परंपरा से जुड़ी अधिकांश सामग्री लोक-मान्यता और आधुनिक संकलनों पर आधारित है, अकादमिक प्रमाण सीमित हैं। इंटरनेट पर उपलब्ध “सिद्धि” के दावे वाले मंत्र-प्रयोग प्रायः अप्रामाणिक होते हैं। इसीलिए इस लेख में कोई मंत्र या प्रयोग-विधि नहीं दी जा रही — जैसा क्रिया योग के विषय में भी हमने स्पष्ट किया है, ऐसी साधनाएँ योग्य गुरु के मार्गदर्शन का विषय हैं।
गोरखनाथ मठ और प्रमुख स्थान
गोरखनाथ की उपस्थिति भूगोल में भी दर्ज है:
- गोरखपुर, उत्तर प्रदेश — प्रमुख गोरखनाथ मठ और मंदिर; नगर का नाम ही उन्हीं पर पड़ा
- नेपाल — पशुपतिनाथ क्षेत्र तथा दांग घाटी में मंदिर
- गर्भगिरि पर्वत, वांबोरी (अहमदनगर, महाराष्ट्र)
- ओडिशा और तमिलनाडु (नागपट्टिनम के पास जीव-समाधि स्थल)
- भारत भर में अनेक गुफाएँ, जिन्हें उनके साधना-स्थल मानकर वहाँ मंदिर बने
किंवदंती और इतिहास — रेखा कहाँ है?
यह अंतर समझना सबसे ज़रूरी है, क्योंकि इंटरनेट पर दोनों को मिला दिया जाता है।
जो ऐतिहासिक रूप से स्वीकार्य है: वे 11वीं से 14वीं शताब्दी के बीच हुए; उन्होंने नाथ मठ-परंपरा को संगठित किया; उनके नाम से महत्वपूर्ण योग-ग्रंथ जुड़े हैं; कबीर और गुरु नानक की वाणी में उनका उल्लेख है; उनके नाम पर मठ-मंदिर स्थापित हुए।
जो परंपरा और भक्ति-साहित्य का क्षेत्र है: उनका अलौकिक होना, विभिन्न युगों में प्रकट होना, वर्षों तक अचल समाधि, और अनेक चमत्कार-कथाएँ। इनका खंडन आवश्यक नहीं — पर इन्हें ऐतिहासिक तथ्य कहकर प्रस्तुत करना ठीक नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गोरखनाथ के गुरु कौन थे?
मत्स्येंद्रनाथ। परंपरा इस शृंखला को आदिनाथ (शिव) → मत्स्येंद्रनाथ → गोरखनाथ के क्रम में रखती है।
क्या गोरखनाथ ने नाथ संप्रदाय की स्थापना की?
नाथ धारा उनसे पहले भी थी, पर उसे संगठित मठ-व्यवस्था और स्पष्ट साधना-पद्धति गोरखनाथ ने दी। इसी अर्थ में उन्हें संस्थापक कहा जाता है।
गोरखनाथ और हठयोग का क्या संबंध है?
उनके नाम से जुड़ा सिद्ध सिद्धांत पद्धति हठयोग के प्राचीनतम ग्रंथों में गिना जाता है। पर “हठयोग के जनक गोरखनाथ थे” — यह दावा विद्वानों में विवादित है।
कनफटा योगी कौन होते हैं?
नाथ संप्रदाय के वे साधक जो दीक्षा के समय कानों में विशेष कुंडल धारण करते हैं। “कनफटा” नाम इसी परंपरा से आया।
निष्कर्ष
गोरखनाथ की सबसे बड़ी देन शायद कोई चमत्कार नहीं, बल्कि एक निर्णय था — साधना को संस्कृत के दायरे से निकालकर आम आदमी की भाषा और पहुँच में लाना। जाति और कर्मकांड की दीवारें हटाकर उन्होंने योग को उन लोगों तक पहुँचाया जिनके लिए वह कभी सुलभ नहीं था।
यही स्वर आगे चलकर लाहिड़ी महाशय जैसे गृहस्थ योगियों में और ज्ञानगंज की परंपरा में भी सुनाई देता है — कि सिद्धि किसी वर्ग की बपौती नहीं, साधना की निरंतरता का फल है।
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