परिचय: ज्योतिर्लिंग क्या है? साधारण शिवलिंग और ज्योतिर्लिंग में अंतर
सनातन धर्म में देवाधिदेव महादेव भगवान शिव की पूजा मुख्य रूप से ‘शिवलिंग’ के रूप में की जाती है। लेकिन जब हम ‘ज्योतिर्लिंग’ शब्द सुनते हैं, तो हमारे मन में एक स्वाभाविक जिज्ञासा उठती है—साधारण शिवलिंग और ज्योतिर्लिंग में क्या अंतर है? और पूरी पृथ्वी पर कुल कितने ज्योतिर्लिंग हैं?
शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता के अनुसार, ‘ज्योति’ का अर्थ होता है—दिव्य आध्यात्मिक प्रकाश, और ‘लिंग’ का अर्थ होता है—प्रतीक या चिह्न। अर्थात ज्योतिर्लिंग भगवान शिव का वह स्वयंभू (Self-Manifested) प्रकाश-स्तंभ है जिसका न कोई प्रारंभ है और न कोई अंत।
प्रकाश-स्तंभ के प्राकट्य की कथा
कथा के अनुसार, एक बार सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा और पालनहार भगवान विष्णु के बीच यह विवाद उत्पन्न हो गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है? दोनों के अहंकार को शांत करने के लिए, उन दोनों के बीच अचानक एक विशाल, अनंत और धधकता हुआ ‘अग्नि-स्तंभ’ (Pillar of Cosmic Light) प्रकट हो गया।
भगवान विष्णु उस स्तंभ का निचला छोर (जड़) खोजने नीचे पाताल की ओर गए, और ब्रह्मा जी हंस पर सवार होकर उसका ऊपरी छोर खोजने आकाश की ओर उड़े। हज़ारों वर्षों तक खोजने के बाद भी दोनों में से किसी को उस प्रकाश-स्तंभ का आदि या अंत नहीं मिला। तब उस ज्योति-स्तंभ के भीतर से साक्षात देवाधिदेव महादेव प्रकट हुए। ब्रह्मा और विष्णु दोनों ने हाथ जोड़कर महादेव की स्तुति की।
भगवान शिव ने वरदान दिया कि पृथ्वी के जिन 12 पावन स्थानों पर वे अपनी दिव्य ज्योति के रूप में भक्तों के कल्याण के लिए सदा विराजमान रहेंगे, वे ‘द्वादश ज्योतिर्लिंग’ (12 Jyotirlingas) कहलाएंगे। साधारण शिवलिंग किसी संत, राजा या भक्त द्वारा प्राण-प्रतिष्ठित किए जाते हैं, लेकिन 12 ज्योतिर्लिंग साक्षात परमात्मा शिव की अपनी संकल्प-शक्ति से प्रकट हुए हैं।
आदि शंकराचार्य जी ने द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में इन सभी पावन धामों का नित्य स्मरण करने का आदेश दिया है:
“सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥
परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशङ्करम्। सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने॥
वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये॥”
आइए, इस विस्तृत लेख में भारत के इन पावन 12 ज्योतिर्लिंगों के नाम, उनकी कथा, भौगोलिक स्थिति और उनसे जुड़े चमत्कारी रहस्यों को सरल, बोलचाल की हिंदी में गहराई से समझें।
द्वादश ज्योतिर्लिंगों की संपूर्ण मास्टर तालिका (Master Comparison Table)
| क्र. | ज्योतिर्लिंग का नाम | राज्य / स्थान | नदी / पर्वत | प्रमुख विशेषता / रहस्य |
|---|---|---|---|---|
| 1 | सोमनाथ (Somnath) | गुजरात (सौराष्ट्र) | अरब सागर तट, त्रिवेणी संगम | प्रथम ज्योतिर्लिंग; बाणस्तंभ (Antarctica तक कोई भूमि नहीं)। |
| 2 | मल्लिकार्जुन (Mallikarjuna) | आंध्र प्रदेश (कर्नूल) | श्रीशैल पर्वत, कृष्णा नदी | दक्षिण का कैलाश; शक्तिपीठ और ज्योतिर्लिंग का संगम। |
| 3 | महाकालेश्वर (Mahakaleshwar) | मध्य प्रदेश (उज्जैन) | शिप्रा नदी तट | एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग; विश्वप्रसिद्ध भस्म आरती। |
| 4 | ओंकारेश्वर (Omkareshwar) | मध्य प्रदेश (खंडवा) | नर्मदा नदी, मांधाता पर्वत | प्राकृतिक ‘ॐ’ आकार का द्वीप; ओंकारेश्वर व ममलेश्वर स्वरूप। |
| 5 | केदारनाथ (Kedarnath) | उत्तराखंड (रुद्रप्रयाग) | मंदाकिनी नदी, केदारडोम | सबसे ऊंचा (11,755 फीट); पांडवों की मुक्ति स्थली। |
| 6 | भीमाशंकर (Bhimashankar) | महाराष्ट्र (पुणे) | सह्याद्रि पर्वत, भीमा नदी | भीम राक्षस का वध; मोटेश्वर महादेव का मोटा शिवलिंग। |
| 7 | काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath) | उत्तर प्रदेश (वाराणसी) | गंगा नदी तट | शिव के त्रिशूल पर टिकी नगरी; मुक्ति और मोक्ष का धाम। |
| 8 | त्र्यंबकेश्वर (Trimbakeshwar) | महाराष्ट्र (नासिक) | ब्रह्मगिरि पर्वत, गोदावरी | ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का एक साथ संयुक्त लिंग। |
| 9 | वैद्यनाथ (Baidyanath Dham) | झारखंड (देवघर) | संथाल परगना | कामना लिंग; रावण की तपस्या; 105 किमी कांवड़ यात्रा। |
| 10 | नागेश्वर (Nageshwar) | गुजरात (द्वारका के पास) | दारुकावन क्षेत्र | नागों के अधिपति; सुप्रिय वैश्य की रक्षा की पावन गाथा। |
| 11 | रामेश्वरम (Rameshwaram) | तमिलनाडु (रामनाथपुरम) | हिन्द महासागर, मन्नार की खाड़ी | प्रभु श्रीराम व सीता जी द्वारा बालू से निर्मित सेतुबंध लिंग। |
| 12 | घृष्णेश्वर (Grishneshwar) | महाराष्ट्र (संभाजीनगर/औरंगाबाद) | एलोरा की गुफाएं | 12वां अंतिम ज्योतिर्लिंग; घृष्णा की अटूट शिवभक्ति का प्रमाण। |
12 ज्योतिर्लिंगों की पावन कथाएं और अलौकिक रहस्य
1. श्री सोमनाथ: प्रथम ज्योतिर्लिंग और बाणस्तंभ का रहस्य
गुजरात के सौराष्ट्र में समुद्र तट पर स्थित सोमनाथ को पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है।
कथा के अनुसार, चंद्रदेव (सोम) का विवाह राजा दक्ष की 27 पुत्रियों (27 नक्षत्रों) के साथ हुआ था। लेकिन चंद्रदेव केवल रोहिणी से सबसे अधिक प्रेम करते थे। दक्ष प्रजापति ने क्रोधित होकर चंद्रदेव को ‘क्षय रोग’ (Tuberculosis / तेजहीन होने) का शाप दे दिया। चंद्रदेव ने सौराष्ट्र के प्रभास क्षेत्र में आकर भगवान शिव की घोर तपस्या की। भगवान शिव ने प्रकट होकर चंद्रदेव को अमरता और शुक्ल पक्ष में पुनः बढ़ने का वरदान दिया और ‘सोमनाथ’ (चंद्रमा के स्वामी) कहलाए।
बाणस्तंभ का रहस्य: सोमनाथ मंदिर के परिसर में समुद्र किनारे 6वीं शताब्दी का एक ‘बाणस्तंभ’ खड़ा है। उस पर संस्कृत में लिखा है कि इस स्तंभ की सीधी दिशा में दक्षिणी ध्रुव (Antarctica) तक समुद्र में एक भी पर्वत या भू-भाग (जमीन) नहीं है! बिना किसी सैटेलाइट के प्राचीन ऋषियों को यह भूगोल कैसे पता था? यह आज भी आधुनिक विज्ञान को चौंका देता है।
2. श्री मल्लिकार्जुन: श्रीशैल पर्वत पर माता पार्वती और शिव का वास
आंध्र प्रदेश के कर्नूल जिले में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल पर्वत पर स्थित मल्लिकार्जुन को ‘दक्षिण का कैलाश’ कहा जाता है।
कथा के अनुसार, जब भगवान गणेश का विवाह पहले हो गया, तो उनके बड़े भाई कार्तिकेय (स्कंद) रुष्ट होकर क्रौंच पर्वत पर चले गए। अपने पुत्र के वियोग में माता पार्वती (मल्लिका) और भगवान शिव (अर्जुन) स्वयं इस पर्वत पर आए। मल्लिका और अर्जुन दोनों के नाम से यह ज्योतिर्लिंग ‘मल्लिकार्जुन’ कहलाया। यह भारत का एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ भगवान शिव का ज्योतिर्लिंग और 51 शक्तिपीठों में से एक (भ्रमराम्बा शक्तिपीठ) दोनों एक ही मंदिर परिसर में स्थित हैं।
3. श्री महाकालेश्वर: उज्जैन के राजा और भस्म आरती का सत्य
मध्य प्रदेश की पावन शिप्रा नदी के तट पर स्थित महाकालेश्वर 12 ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो ‘दक्षिणमुखी’ है। तंत्र और योग शास्त्र में दक्षिण दिशा मृत्यु और यमराज की दिशा मानी जाती है; जो साधक दक्षिणमुखी महाकाल के दर्शन कर लेता है, उसे अकाल मृत्यु का कोई भय नहीं रहता।
उज्जैन में ‘दूषण’ नामक अत्याचारी राक्षस से अवंतिका के ब्राह्मणों और प्रजा की रक्षा के लिए भगवान शिव हुंकार भरकर धरती फाड़कर प्रकट हुए थे। यहाँ हर सुबह 4:00 बजे होने वाली ‘भस्म आरती’ पूरी दुनिया में विख्यात है, जो मनुष्य को याद दिलाती है कि यह शरीर एक दिन राख बन जाएगा, केवल महाकाल ही सत्य हैं।
4. श्री ओंकारेश्वर: नर्मदा के पावन ‘ॐ’ द्वीप का चमत्कार
मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में पवित्र नर्मदा नदी जब दो धाराओं में बँटती है, तो बीच में एक द्वीप बनता है जिसका आकार प्राकृतिक रूप से देवनागरी लिपि के ‘ॐ’ (Om) जैसा है। इसे ‘मांधाता द्वीप’ कहा जाता है।
सूर्यवंशी राजा मांधाता ने यहाँ घोर तपस्या करके भगवान शिव को प्रसन्न किया था। यहाँ ज्योतिर्लिंग के दो स्वरूप पूजे जाते हैं—द्वीप पर ओंकारेश्वर और नर्मदा के तट पर ममलेश्वर (अमलेश्वर)। दोनों के दर्शन करने पर ही संपूर्ण परिक्रमा का फल मिलता है।
5. श्री केदारनाथ: हिमालय की गोद में पांडवों की मुक्ति-स्थली
उत्तराखंड में 11,755 फीट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ धाम 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे ऊंचा है। महाभारत युद्ध के बाद गोत्र-हत्या के पाप से मुक्ति पाने के लिए जब पांडव शिवजी को खोजते हुए यहाँ पहुँचे, तो भोलेनाथ ने नंदी (बैल) का रूप धारण कर लिया।
भीम द्वारा नंदी को पकड़ने पर शिवजी का कूबड़ (Hump) यहीं रह गया और बाकी अंग पंच केदार के रूप में प्रकट हुए। 2013 की प्रलय में मंदिर के पीछे ‘भीम शिला’ का आकर मंदिर को सुरक्षित बचा लेना आज भी साक्षात महादेव की जाग्रत उपस्थिति का प्रमाण है।
6. श्री भीमाशंकर: पश्चिमी घाट में कुंभकर्ण के पुत्र का वध
महाराष्ट्र के पुणे के पास सह्याद्रि की पर्वतमालाओं में स्थित भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग भीमा नदी का उद्गम स्थल भी है।
रामायण काल में कुंभकर्ण के पुत्र ‘भीम’ नामक राक्षस ने जब कामरूप (असम) के राजा सुदक्षिण को बंदी बनाकर धर्म का नाश करना चाहा, तो राजा सुदक्षिण ने मिट्टी का शिवलिंग बनाकर शिवजी की आराधना की। भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से भीम राक्षस का वध किया और देवताओं की प्रार्थना पर उसी स्थान पर विशाल ‘भीमाशंकर’ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित हुए।
7. श्री काशी विश्वनाथ: भगवान शिव के त्रिशूल पर बसी मोक्षनगरी
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गंगा तट पर स्थित काशी विश्वनाथ सनातन धर्म का हृदय माना जाता है। पुराणों में लिखा है कि जब महाप्रलय में पूरी पृथ्वी जलमग्न हो जाएगी, तब भी काशी नहीं डूबेगी क्योंकि भगवान शिव इसे अपने त्रिशूल की नोक पर उठा लेंगे।
काशी में मरने वाले हर प्राणी के कान में स्वयं महादेव ‘तारक मंत्र’ फूँककर उसे जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त कर देते हैं। अहिल्याबाई होल्कर द्वारा पुनर्निर्मित यह पावन मंदिर आज भी करोड़ों भक्तों को परम शांति प्रदान करता है।
8. श्री त्र्यंबकेश्वर: त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) का अद्वितीय लिंग
महाराष्ट्र के नासिक में ब्रह्मगिरि पर्वत की तलहटी में स्थित त्र्यंबकेश्वर पूरी दुनिया का एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जहाँ एक ही अर्घे में ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों के तीन छोटे-छोटे लिंग स्थापित हैं।
महर्षि गौतम पर जब गौ-हत्या का झूठा कलंक लगा, तो उन्होंने भगवान शिव की घोर तपस्या की। भगवान शिव ने उनकी निष्पाप भक्ति से प्रसन्न होकर गंगा जी को अपने केशों से यहाँ उतारा, जिसे दक्षिण भारत में ‘गोदावरी’ कहा जाता है। यहाँ कालसर्प दोष और नारायण नागबलि पूजा का विशेष महत्व है।
9. श्री वैद्यनाथ: रावण की तपस्या और 105 किमी की कांवड़ यात्रा
झारखंड के देवघर में स्थित वैद्यनाथ धाम (बाबा बैद्यनाथ) को ‘कामना लिंग’ कहा जाता है।
लंकापति रावण ने भगवान शिव को लंका ले जाने के लिए यहाँ अपने 10 सिर एक-एक करके हवन कुंड में काट कर अर्पित कर दिए थे। जब 10वां सिर काटने लगा, तो भोलेनाथ ने प्रकट होकर रावण के सभी सिर जोड़ दिए और एक ‘वैद्य’ (डॉक्टर) की तरह उसके घावों को भर दिया। इसी कारण उनका नाम ‘वैद्यनाथ’ पड़ा। सावन के महीने में बिहार के सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगाजल लेकर लाखों कांवड़िए 105 किलोमीटर नंगे पैर पैदल चलकर यहाँ जल अर्पित करते हैं।
10. श्री नागेश्वर: दारुकावन में सुप्रिय वैश्य की रक्षा
गुजरात में द्वारका से लगभग 17 किलोमीटर दूर दारुकावन में स्थित नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का अर्थ है—’नागों के ईश्वर’।
कथा के अनुसार, ‘दारुका’ राक्षसी के पति दारुक ने सुप्रिय नामक एक परम शिवभक्त वैश्य को समुद्र में जहाज सहित बंदी बना लिया था। जेल में बंद सुप्रिय ने सभी बंदियों को ‘ॐ नमः शिवाय’ का मंत्र सिखाया। जब दारुक ने सुप्रिय को मारने के लिए तलवार उठाई, तो भगवान शिव एक दिव्य गुफा से प्रकट हुए और उन्होंने पाशुपतास्त्र से सभी राक्षसों का संहार करके सुप्रिय की रक्षा की।
11. श्री रामेश्वरम: प्रभु श्रीराम द्वारा बालू से स्थापित सेतुबंध लिंग
तमिलनाडु के रामनाथपुरम जिले में हिन्द महासागर के तट पर स्थित श्री रामेश्वरम भारत के चार प्रमुख धामों में से एक है।
रावण का वध करने और लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व, भगवान श्रीराम ने समुद्र तट पर महादेव की पूजा करने का संकल्प लिया। हनुमान जी को काशी से शिवलिंग लाने भेजा गया, लेकिन मुहूर्त का समय बीतने लगा। तब माता सीता ने अपने हाथों से समुद्र की रेत (बालू) से एक दिव्य शिवलिंग बनाया। प्रभु राम ने उसकी प्राण-प्रतिष्ठा की और उसे ‘रामेश्वर’ (राम के ईश्वर) नाम दिया। यहाँ स्थित 22 पावन तीर्थ कुंडों में स्नान करने से सभी पापों का नाश माना जाता है।
12. श्री घृष्णेश्वर: घृष्णा की अटूट भक्ति और मृत पुत्र का पुनर्जीवन
महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) के पास, विश्वप्रसिद्ध एलोरा की गुफाओं के निकट स्थित घृष्णेश्वर (घुश्मेश्वर) 12 ज्योतिर्लिंगों की श्रृंखला का अंतिम ज्योतिर्लिंग है।
सुधर्मा नामक ब्राह्मण की पत्नी घृष्णा भगवान शिव की अनन्य भक्त थी। वह प्रतिदिन 101 पार्थिव शिवलिंग बनाकर सरोवर में विसर्जित करती थी। उसकी निःसंतान सौत ने ईर्ष्यावश घृष्णा के इकलौते पुत्र की हत्या करके उसी सरोवर में फेंक दिया। लेकिन घृष्णा ने अपने पुत्र की मृत्यु पर रोने के बजाय अपनी नित्य शिव-पूजा जारी रखी। जब वह 101वां शिवलिंग विसर्जित करने गई, तो साक्षात महादेव प्रकट हुए और उसका मृत पुत्र जीवित होकर सरोवर से बाहर आ गया! भगवान शिव घृष्णा की भक्ति से प्रसन्न होकर वहीं सदा के लिए स्थापित हो गए।
12 ज्योतिर्लिंग और 12 राशियां: ज्योतिषीय संबंध
वैदिक ज्योतिष के अनुसार, हमारे ब्रह्मांड की 12 राशियां सीधे तौर पर 12 ज्योतिर्लिंगों की ऊर्जा से जुड़ी हुई हैं। यदि कोई व्यक्ति अपनी जन्म राशि के अनुसार संबंधित ज्योतिर्लिंग का दर्शन या मानसिक स्मरण करे, तो उसकी कुंडली के सभी ग्रह-दोष शांत हो जाते हैं:
- मेष राशि: श्री सोमनाथ (गुजरात)
- वृषभ राशि: श्री मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश)
- मिथुन राशि: श्री महाकालेश्वर (उज्जैन)
- कर्क राशि: श्री ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश)
- सिंह राशि: श्री वैद्यनाथ (झारखंड)
- कन्या राशि: श्री भीमाशंकर (महाराष्ट्र)
- तुला राशि: श्री रामेश्वरम (तमिलनाडु)
- वृश्चिक राशि: श्री नागेश्वर (गुजरात)
- धनु राशि: श्री काशी विश्वनाथ (वाराणसी)
- मकर राशि: श्री त्र्यंबकेश्वर (नासिक)
- कुंभ राशि: श्री केदारनाथ (उत्तराखंड)
- मीन राशि: श्री घृष्णेश्वर (महाराष्ट्र)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्र. 1: क्या 12 ज्योतिर्लिंगों की यात्रा किसी विशेष क्रम में करनी चाहिए?
उत्तर: शास्त्रों में आदि शंकराचार्य जी के स्तोत्र के अनुसार सबसे पहले सौराष्ट्र के ‘सोमनाथ’ से यात्रा शुरू करने की परंपरा बताई गई है। हालांकि आधुनिक समय में भौगोलिक दूरी और यात्रा की सुविधा के अनुसार श्रद्धालु अपनी सुविधानुसार किसी भी ज्योतिर्लिंग से दर्शन शुरू कर सकते हैं। भाव और श्रद्धा ही सर्वोपरि है।
प्र. 2: वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग को लेकर क्या विवाद है (देवघर बनाम परली)?
उत्तर: शिव पुराण के श्लोक में ‘परल्यां वैद्यनाथं’ आता है। महाराष्ट्र के बीड जिले में स्थित ‘परली वैद्यनाथ’ और झारखंड के देवघर स्थित ‘बाबा बैद्यनाथ धाम’ दोनों को ज्योतिर्लिंग के रूप में माना जाता है। अधिकांश विद्वान और परंपरा झारखंड के देवघर स्थित मंदिर को मुख्य ज्योतिर्लिंग मानती है, जहाँ सावन की प्रसिद्ध कांवड़ यात्रा होती है।
प्र. 3: क्या घर में पार्थिव शिवलिंग की पूजा करने से ज्योतिर्लिंग का फल मिलता है?
उत्तर: हाँ, शिव पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि जो भक्त प्रतिदिन मिट्टी या नर्मदेश्वर पत्थर के शिवलिंग का विधिवत पूजन करता है और द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र का पाठ करता है, उसे घर बैठे ही 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन के समान पुण्य प्राप्त होता है।
प्र. 4: 12 ज्योतिर्लिंगों में सबसे कठिन यात्रा किस धाम की है?
उत्तर: उत्तराखंड स्थित ‘श्री केदारनाथ धाम’ की यात्रा सबसे कठिन मानी जाती है क्योंकि यह 11,755 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और गौरीकुंड से 16-18 किमी की खड़ी पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है। इसके अलावा सर्दियों में बर्फबारी के कारण यह 6 महीने बंद रहता है।
निष्कर्ष: अनंत ज्योति का अमर आह्वान
द्वादश ज्योतिर्लिंग केवल तीर्थ स्थल नहीं हैं; वे भारत की आध्यात्मिक रीढ़ (Spiritual Spine) हैं। उत्तर में केदारनाथ से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक, और पश्चिम में सोमनाथ से लेकर पूर्व में वैद्यनाथ तक—ये 12 पावन प्रकाश-स्तंभ संपूर्ण भारत को एकता, शांति और भक्ति के एक अटूट सूत्र में पिरोते हैं।
जब भी मनुष्य जीवन के संघर्षों, चिंताओं और मृत्यु के भय से घिर जाए, तो उसे इन 12 ज्योतिर्लिंगों के पावन स्वरूप का स्मरण करना चाहिए। भगवान शिव का यह अनंत प्रकाश हमारे भीतर के अंधकार को मिटाकर हमें निर्भय और शांत बना देता है।
द्वादश ज्योतिर्लिंगाय नमः । हर हर महादेव ।

