भारतीय संत परंपरा में ज्ञान, वैराग्य और भक्ति के अनेक महान शिखर हुए हैं, लेकिन जब असीम करुणा, अगाध क्षमाशीलता और सभी प्राणियों में समभाव की बात आती है, तो 16वीं शताब्दी के महाराष्ट्र के महान वारकरी संत संत एकनाथ महाराज (Sant Eknath, 1533–1599 ई.) का नाम सबसे ऊपर चमकता है।
संत एकनाथ उस दौर के संत थे जब संत ज्ञानेश्वर और संत नामदेव द्वारा शुरू किया गया भक्ति आंदोलन थोड़ा शिथिल पड़ रहा था और समाज में दोबारा छुआछूत, कर्मकांड और पाखंड का बोलबाला बढ़ रहा था। संत एकनाथ ने संत ज्ञानेश्वर की भक्ति-धारा को पुनर्जीवित किया और बाद में संत तुकाराम के लिए एक सुदृढ़ आधार तैयार किया। यही कारण है कि उन्हें वारकरी संप्रदाय का ‘मजबूत स्तम्भ’ माना जाता है।
संत एकनाथ की करुणा केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं थी; वे हर चींटी, कुत्ते, पेड़ और यहाँ तक कि एक प्यासे तड़पते गधे में भी साक्षात भगवान का दर्शन करते थे। उन्होंने घर-गृहस्थी में रहते हुए भी संन्यास से भी ऊंची आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त करके दिखाई। इस विस्तृत लेख में हम संत एकनाथ के जन्म, गुरु जनार्दन स्वामी से मिलन, प्यासे गधे को गंगाजल पिलाने का अमर प्रसंग, 108 बार थूकने वाले दुष्ट को क्षमा करने की अद्भुत घटना, ‘एकनाथी भागवत’ की रचना, और गोदावरी में उनकी पावन जल-समाधि को बहुत ही सरल, आत्मीय और बोलचाल की हिंदी में जानेंगे।
जन्म और बाल्यकाल: पैठण के पावन गोदावरी तट पर प्राकट्य
संत एकनाथ का जन्म संवत 1590 (सन् 1533 ईस्वी) में महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) के निकट पवित्र गोदावरी नदी के तट पर बसे ऐतिहासिक नगर पैठण (प्राचीन प्रतिष्ठानपुर) में हुआ था।
वे एक अत्यंत कुलीन, विद्वान और धर्मनिष्ठ ऋग्वेदी ब्राह्मण परिवार से थे। उनके परदादा संत भानुदास जी थे — वही महान भक्त जिन्होंने विजयनगर साम्राज्य के राजा कृष्णदेवराय के पास से भगवान विट्ठल की मूल मूर्ति को बड़े संघर्ष के बाद वापस लाकर पंढरपुर के मंदिर में पुनः स्थापित किया था। एकनाथ के पिता का नाम सूर्यनारायण और माता का नाम रुक्मिणी था।
बचपन में माता-पिता का साया उठा
दुर्भाग्य से जब एकनाथ केवल कुछ ही महीनों के शिशु थे, तभी उनके माता-पिता दोनों का असामयिक देहांत हो गया। बालक एकनाथ का पालन-पोषण उनके दादा चक्रपाणि और दादी सरस्वती बाई ने अत्यंत लाड़-प्यार और संस्कारों के साथ किया।
बचपन से ही एकनाथ का मन खेलकूद की बजाय पूजा-पाठ, गोदावरी स्नान और भगवान शिव की आराधना में लगता था। वे अक्सर मिट्टी के शिवलिंग बनाकर घंटों ध्यानमग्न बैठ जाते थे। उनकी बुद्धि इतनी तीव्र थी कि अल्पायु में ही उन्होंने संस्कृत व्याकरण और शास्त्रों का अध्ययन शुरू कर दिया था।
गुरु की खोज और देवगिरि (दौलताबाद) में ६ वर्ष की कठोर सेवा
जब एकनाथ 12 वर्ष के हुए, तो उनके भीतर किसी सच्चे आत्मज्ञानी गुरु को पाने की तड़प जाग उठी। उन्होंने सुना कि देवगिरि (दौलताबाद) के किलेदार स्वामी जनार्दन पंत (जनार्दन स्वामी) एक परम सिद्ध और भगवान दत्तात्रेय के साक्षात कृपापात्र संत हैं।
एकनाथ किसी को बताए बिना रात के अंधेरे में चुपचाप पैठण से दौलताबाद के लिए निकल पड़े। जब वे देवगिरि पहुंचे, तो जनार्दन स्वामी के चरणों में गिर पड़े और प्रार्थना की, “गुरुदेव! मुझे अपनी शरण में ले लीजिए, मुझे केवल आत्म-कल्याण चाहिए।” जनार्दन स्वामी ने बालक के चेहरे के अलौकिक तेज को देखकर तुरंत पहचान लिया कि यह कोई साधारण बालक नहीं है। उन्होंने एकनाथ को अपना शिष्य स्वीकार कर लिया।
एक पैसे की भूल सुधारने की ऐतिहासिक एकाग्रता
जनार्दन स्वामी ने एकनाथ को देवगिरि किले के खजाने और प्रशासनिक खातों (लेखा-जोखा) की देखभाल का काम सौंपा। एकनाथ पूरी ईमानदारी से काम करते थे।
एक रात जनार्दन स्वामी जब आधी रात को उठे, तो उन्होंने देखा कि एकनाथ दीपक की मद्धिम रोशनी में बही-खाता खोले पसीने से तर-बतर बैठे हैं। स्वामी जी ने पूछा, “बेटा! रात के दो बज रहे हैं, तुम अभी तक सोए क्यों नहीं?”
एकनाथ ने हाथ जोड़कर कहा, “गुरुदेव! खातों का मिलान करते समय एक पैसे (पाई) का अंतर आ रहा है। जब तक यह हिसाब सही नहीं हो जाता, मुझे नींद नहीं आ सकती।” यह कहकर वे फिर से हिसाब जोड़ने में लग गए। थोड़ी देर बाद अचानक एकनाथ खुशी से उछल पड़े और ताली बजाने लगे, “मिल गई भूल! एक पैसा मिल गया!”
जनार्दन स्वामी उनके पीछे खड़े मुस्कुरा रहे थे। उन्होंने एकनाथ के कंधे पर हाथ रखा और बड़े प्यार से कहा:
“एका! तुमने एक पैसे की भूल सुधारने के लिए अपनी पूरी नींद और भूख भुला दी। जिस दिन तुम्हारी यही एकाग्रता और लगन भगवान के चरणों में लग जाएगी, उस दिन तुम्हें साक्षात परब्रह्म के दर्शन हो जाएंगे!”
जनार्दन स्वामी ने एकनाथ को एकांत में ले जाकर दत्तात्रेय संप्रदाय की गुप्त साधनाएं सिखाईं और कुछ ही समय बाद उन्हें भगवान दत्तात्रेय के साक्षात दर्शन कराए। 6 वर्षों तक गुरु की निष्काम सेवा करने के बाद, गुरु की आज्ञा से एकनाथ ने पूरे भारत के प्रमुख तीर्थों (काशी, बद्रीनाथ, रामेश्वरम, द्वारका) की पदयात्रा की और फिर वापस पैठण लौट आए।
गृहस्थ आश्रम में प्रवेश: सांसारिक जीवन में भक्ति का आदर्श
अधिकांश लोग सोचते हैं कि भगवान को पाने के लिए संन्यासी बनना पड़ता है या जंगल जाना पड़ता है। लेकिन गुरु जनार्दन स्वामी के आदेश पर संत एकनाथ ने पैठण लौटकर गिरिजाबाई नामक एक अत्यंत सुशील, धर्मनिष्ठ और पतिव्रता कन्या से विवाह किया।
एकनाथ ने सिद्ध कर दिया कि गृहस्थ आश्रम किसी तपोवन से कम नहीं है। उनके घर में दिन-रात संतों, गरीबों, यात्रियों और भूखों के लिए अन्नक्षेत्र खुला रहता था। वे खुद खेती और पुरोहिताई से जो कुछ कमाते, उसी से परिवार चलाते और बाकी सब दान कर देते थे। गिरिजाबाई ने भी अपने पति के हर परोपकारी कार्य में पूरा सहयोग दिया।
संत एकनाथ की असीम करुणा के अमर प्रसंग
संत एकनाथ का पूरा जीवन ऐसी घटनाओं से भरा है जो दिखाती हैं कि उनकी करुणा और क्षमाशीलता साधारण मानवीय सीमाओं से बहुत ऊपर थी:
१. प्यासे गधे को रामेश्वरम का पवित्र गंगाजल पिलाना
संत एकनाथ अपने शिष्यों और तीर्थयात्रियों के साथ प्रयागराज और काशी से कांवड़ में पवित्र गंगाजल भरकर पैदल दक्षिण भारत के रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग पर अभिषेक करने जा रहे थे। उन दिनों काशी का गंगाजल रामेश्वरम तक पैदल ले जाना अत्यंत कठिन और परम पुण्य का कार्य माना जाता था।
मई-जून की भीषण चिलचिलाती धूप थी। राजस्थान और मध्य भारत के एक वीरान, रेतीले रास्ते से गुजरते समय एकनाथ ने देखा कि सड़क किनारे एक गधा प्यास के मारे तड़प रहा है। पानी न मिलने के कारण वह जमीन पर गिर चुका था, उसकी जीभ बाहर लटक रही थी, आंखें पलट चुकी थीं और वह अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था।
यह देखकर एकनाथ का हृदय दया से तड़प उठा। उन्होंने बिना एक पल भी गंवाए अपने कंधे से कांवड़ उतारी, घड़े का मुंह खोला और वह पवित्र गंगाजल उस मरते हुए गधे के मुंह में डालना शुरू कर दिया! गधे ने गटागट पूरा गंगाजल पी लिया। कुछ ही मिनटों में गधे में नई जान आ गई। वह उठकर खड़ा हुआ और उसने प्यार से एकनाथ की ओर देखा और कान हिलाते हुए आगे बढ़ गया।
साथी तीर्थयात्री और पंडित गुस्से से लाल-पीले हो गए। उन्होंने एकनाथ को धिक्कारा, “अरे एकनाथ! तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? तुमने काशी से इतनी मेहनत से लाया हुआ पवित्र गंगाजल एक अछूत और गंदे गधे के मुंह में उड़ेल दिया! अब रामेश्वरम में भगवान शिव पर क्या चढ़ाओगे? तुम्हारा सारा पुण्य नष्ट हो गया!”
संत एकनाथ ने दोनों हाथ जोड़कर शांत मुस्कान के साथ कहा:
“भाइयों! मुझे इस तड़पते हुए गधे के भीतर भी साक्षात मेरे भोलेनाथ रामेश्वर ही प्यासे दिखाई दिए। यदि मैं अपनी आंखों के सामने इस बेजुबान जीव को प्यास से मरता छोड़ देता और पत्थर के शिवलिंग पर जल चढ़ाने जाता, तो क्या भगवान शिव कभी प्रसन्न होते? मेरा रामेश्वरम का अभिषेक तो यहीं पूरा हो गया!”
२. १०८ बार थूकने वाले का उद्धार (असीम क्षमा की पराकाष्ठा)
पैठण में एक रूढ़िवादी और दुष्ट व्यक्ति रहता था। उसे एकनाथ की संतों जैसी सहनशीलता देखकर बहुत ईर्ष्या होती थी। उसने अपने दोस्तों से शर्त लगाई कि वह एकनाथ को भयंकर गुस्सा दिलाकर रहेगा।
एक दिन सुबह जब एकनाथ गोदावरी में स्नान करके, स्वच्छ सफेद वस्त्र पहनकर घाट की सीढ़ियां चढ़ रहे थे, तभी वह व्यक्ति सीढ़ियों के ऊपर पान चबाता हुआ खड़ा था। जैसे ही एकनाथ उसके पास पहुंचे, उसने पान की लाल पीक सीधे एकनाथ के मुंह और वस्त्रों पर थूक दी!
कोई भी सामान्य व्यक्ति होता तो तुरंत गाली देता या हाथ उठा देता। लेकिन एकनाथ ने अपने चेहरे से थूक पोंछा, उस व्यक्ति की ओर देखकर हाथ जोड़े और बिना एक शब्द बोले चुपचाप वापस गोदावरी की ओर मुड़ गए। उन्होंने फिर से नदी में डुबकी लगाई, कपड़े धोए और दोबारा सीढ़ियां चढ़ने लगे।
वह दुष्ट व्यक्ति हैरान हुआ, लेकिन उसने अपनी हठ नहीं छोड़ी। जैसे ही एकनाथ दोबारा ऊपर आए, उसने फिर उनके ऊपर थूक दिया! एकनाथ फिर से मुस्कुराए और चुपचाप स्नान करने चले गए।
यह क्रम एक-दो बार नहीं, बल्कि लगातार 108 बार चला! 108 बार उस व्यक्ति ने एकनाथ पर थूका और 108 बार एकनाथ ने शांत भाव से गोदावरी में डुबकी लगाई।
अंत में वह व्यक्ति शारीरिक रूप से थक गया और उसका अहंकार चकनाचूर हो गया। वह कांपते हुए एकनाथ के चरणों में गिर पड़ा और फूट-फूट कर रोने लगा, “महाराज! मुझे क्षमा कर दीजिए, मैं बहुत बड़ा पापी हूँ! आप मुझे जो भी दंड देंगे, मैं भुगतने को तैयार हूँ।”
संत एकनाथ ने अत्यंत प्रेम से उस व्यक्ति को अपने दोनों हाथों से उठाकर अपने सीने से लगा लिया और कहा:
“भाई! तुम रोते क्यों हो? दंड कैसा? मैं तो तुम्हारा जीवन भर आभारी रहूंगा! तुम्हारी कृपा से आज मुझे एक ही दिन में गोदावरी मैया में 108 बार स्नान करने का महापुण्य प्राप्त हुआ, जो मुझे कभी नहीं मिल पाता। तुम तो मेरे उपकारी हो!”
उस व्यक्ति की जिंदगी उस दिन हमेशा के लिए बदल गई और वह एकनाथ का परम भक्त बन गया।
३. तपती रेत में अछूत बालक को सीने से लगाना
एक बार दोपहर की भीषण धूप में गोदावरी की रेत आग की तरह तप रही थी। एक गरीब, तथाकथित अछूत (महार) बालक तपती रेत में अपने घर का रास्ता भटक गया था। उसके नंगे पैर जल रहे थे और वह चीख-चीख कर रो रहा था। कई उच्च कुलीन लोग वहां से गुजर रहे थे, लेकिन छुआछूत के डर से कोई उस बच्चे की मदद नहीं कर रहा था।
जब एकनाथ वहां से निकले, तो उन्होंने छुआछूत की सारी सामाजिक दीवारों को हवा में उड़ा दिया। उन्होंने दौड़कर उस रोते हुए बच्चे को अपनी गोदी में उठा लिया। उन्होंने अपने आंचल से बच्चे के आंसू पोंछे, उसे ठंडा पानी पिलाया और तपती धूप में नंगे पैर चलकर उसे उसके माता-पिता के घर सकुशल पहुंचा दिया।
४. पितरों के श्राद्ध का भोजन भूखों को परोसना
एक बार एकनाथ के घर उनके पूर्वजों का वार्षिक श्राद्ध था। घर में ब्राह्मणों को खिलाने के लिए उत्तम खीर, पूड़ी और 56 प्रकार के स्वादिष्ट पकवान बनाए गए थे। ब्राह्मण अभी नदी से स्नान करके आ ही रहे थे।
तभी एकनाथ ने खिड़की से देखा कि घर के बाहर कुछ गरीब, भूखे और मैले-कुचैले बच्चे और महिलाएं भोजन की खुशबू सूंघकर तड़प रहे हैं। एकनाथ से यह दृश्य नहीं देखा गया। उन्होंने तुरंत अपनी पत्नी से कहा कि सारा भोजन बाहर ले आओ। एकनाथ ने बिना किसी संकोच के वह सारा पवित्र श्राद्ध-भोजन उन भूखे-प्यासे गरीबों को प्रेमपूर्वक भरपेट खिला दिया!
जब रूढ़िवादी पंडित आए और उन्हें यह पता चला, तो वे आगबबूला हो गए और एकनाथ का सामाजिक बहिष्कार करने की धमकी देने लगे। लेकिन तभी एक अद्भुत चमत्कार हुआ — घर के भीतर स्वयं एकनाथ के पूर्वज साक्षात दिव्य रूप में प्रकट हुए और उन्होंने भोजन ग्रहण करके एकनाथ को आशीर्वाद दिया!
संत ज्ञानेश्वर की समाधि की खोज और ‘ज्ञानेश्वरी’ का शुद्धिकरण
संत ज्ञानेश्वर ने 13वीं शताब्दी में भगवद्गीता पर अपनी अमर मराठी टीका ‘ज्ञानेश्वरी’ (भावार्थ दीपिका) रची थी। लेकिन 300 वर्ष बीतने के बाद लोगों ने उसमें अपनी मर्जी से कई अशुद्धियां और मिलावटें जोड़ दी थीं, जिससे उसका मूल रूप बिगड़ गया था।
एक दिन संत ज्ञानेश्वर ने संत एकनाथ के स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, “एकनाथ! आळंदी में मेरी संजीवन समाधि के ऊपर एक अजानवृक्ष (पेड़) की जड़ मेरी गर्दन को छू रही है। तुम आळंदी आओ, मेरी समाधि को मुक्त करो और ज्ञानेश्वरी के मूल रूप को पुनः शुद्ध करो।”
एकनाथ तुरंत आळंदी पहुंचे। उन्होंने समाधि स्थल को साफ किया और वर्षों की कड़ी मेहनत से विभिन्न पुरानी पांडुलिपियों का मिलान करके ‘ज्ञानेश्वरी’ का पहला शुद्ध और प्रामाणिक संस्करण तैयार किया, जिसे आज हम पढ़ते हैं।
संत एकनाथ का विपुल साहित्य (Master Table)
संत एकनाथ ने मराठी साहित्य और अध्यात्म को समृद्ध करने के लिए कई अमर ग्रंथों की रचना की:
| ग्रंथ / साहित्य का नाम | मूल आधार एवं स्वरूप | मुख्य विशेषता एवं प्रभाव |
|---|---|---|
| १. एकनाथी भागवत | श्रीमद्भागवत का ११वां स्कंध (उद्धव गीता) | मराठी भाषा का सर्वोच्च दार्शनिक ग्रंथ। काशी के मणिकर्णिका घाट पर विद्वानों द्वारा हाथी पर इसकी भव्य शोभायात्रा निकाली गई थी। |
| २. भावार्थ रामायण | वाल्मीकि रामायण का आध्यात्मिक मर्म | इसमें प्रभु श्री राम के चरित्र के माध्यम से तत्कालीन समाज में धर्म और राष्ट्रभक्ति की अलख जगाई गई। |
| ३. रुक्मिणी स्वयंवर | श्री कृष्ण और रुक्मिणी का विवाह प्रसंग | जीवात्मा और परमात्मा के आध्यात्मिक मिलन का अत्यंत मधुर और काव्यात्मक निरूपण। |
| ४. भारूड (Bharud) | लोकगीत एवं लोकनाट्य (300+ पद) | सपेरा, बहुरूपिया, धोबी, गोंधली जैसे लोक-पात्रों के माध्यम से समाज के अंधविश्वासों, पाखंड और कुरीतियों पर तीखा व्यंग्य। |
भगवान विट्ठल का सेवक बनकर आना: ‘श्रीखंडिया’ का प्रसंग
संत एकनाथ की निष्काम सेवा, करुणा और अहंकार-शून्यता से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान श्री कृष्ण / विट्ठल एक निर्धन, सीधे-साधे ब्राह्मण युवक का रूप धरकर उनके घर आ गए। उस युवक ने अपना नाम ‘श्रीखंडिया’ बताया।
श्रीखंडिया ने एकनाथ से कहा, “महाराज! मैं अनाथ हूँ, मुझे अपने घर में कोई भी छोटी-मोटी सेवा दे दीजिए, मुझे केवल दो वक्त का रूखा-सूखा भोजन चाहिए।” एकनाथ ने उसे अपने परिवार के सदस्य की तरह रख लिया।
पूरे 12 वर्षों तक भगवान श्री कृष्ण श्रीखंडिया बनकर संत एकनाथ के घर में गोदावरी से पानी की कांवड़ भरकर लाते रहे, पूजा के लिए चंदन (श्रीखंड) घिसते रहे और घर की झाड़ू-बुहारू करते रहे! जब 12 वर्ष बाद द्वारका के एक भक्त के माध्यम से यह रहस्य खुला कि यह सेवक कोई और नहीं बल्कि साक्षात जगतपति भगवान विट्ठल हैं, तो एकनाथ रोते हुए उनके चरणों में गिर पड़े। भगवान ने मुस्कुराते हुए अपने चतुर्भुज रूप में दर्शन दिए और अंतर्धान हो गए।
गोदावरी में जल-समाधि: महाप्रयाण
संवत 1655 (सन् 1599 ईस्वी) के फाल्गुन कृष्ण षष्ठी के पावन दिन, जिसे आज पूरे महाराष्ट्र में ‘एकनाथ षष्ठी’ के रूप में मनाया जाता है, संत एकनाथ ने अपने समस्त शिष्यों, भक्तों और परिजनों को गोदावरी के तट पर बुलाया।
उन्होंने सभी को प्रेमपूर्वक अंतिम उपदेश दिया: “संसार के सभी प्राणियों को ईश्वर का रूप समझो, कभी किसी का दिल मत दुखाओ, और निरंतर नाम-जप करते रहो।” इसके बाद वे शांत भाव से गोदावरी के गहरे जल में उतरे, पद्मासन लगाकर बैठे और समाधि में लीन होकर अपने प्राणों को ब्रह्मरंध्र से मुक्त कर लिया।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
१. संत एकनाथ का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
संत एकनाथ का जन्म सन् 1533 ईस्वी में महाराष्ट्र के औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर) जिले में पवित्र गोदावरी नदी के तट पर बसे पैठण नगर में हुआ था।
२. प्यासे गधे को गंगाजल पिलाने की घटना का क्या संदेश है?
संत एकनाथ जब रामेश्वरम में शिवजी का अभिषेक करने के लिए काशी से गंगाजल ले जा रहे थे, तब उन्होंने रास्ते में एक गधे को प्यास से मरते देखकर वह सारा गंगाजल उसे पिला दिया। उन्होंने सिखाया कि साक्षात परमात्मा हर जीव के भीतर बैठे हैं; किसी तड़पते प्राणी की जान बचाना किसी भी मंदिर में पूजा करने से हजार गुना बड़ा धर्म है।
३. ‘एकनाथी भागवत’ ग्रंथ क्यों प्रसिद्ध है?
यह श्रीमद्भागवत के 11वें स्कंध (उद्धव गीता) पर रची गई मराठी भाषा की सबसे महान दार्शनिक और भक्तिमय टीका है। जब काशी के पंडितों ने इसका विरोध किया, तो परीक्षा के दौरान यह ग्रंथ गंगा में डूबा नहीं बल्कि पानी पर तैरता रहा, जिसके बाद काशी के विद्वानों ने हाथी पर इसकी शोभायात्रा निकाली थी।
४. संत एकनाथ के ‘भारूड’ (Bharud) क्या हैं?
भारूड एक प्रकार का पारंपरिक मराठी लोकगीत और लोकनाट्य है। संत एकनाथ ने आम जनता को पाखंड, छुआछूत और अंधविश्वास से जगाने के लिए 300 से अधिक भारूड रचे, जिनमें सपेरा, धोबी और ज्योतिषी जैसे पात्रों के रूपक द्वारा गहरा आध्यात्मिक ज्ञान दिया गया है।
५. भगवान विट्ठल एकनाथ के घर किस नाम से सेवक बनकर रहे थे?
भगवान विट्ठल ‘श्रीखंडिया’ नामक एक साधारण ब्राह्मण सेवक का रूप धरकर 12 वर्षों तक संत एकनाथ के घर में पानी भरने और चंदन घिसने की सेवा करते रहे थे।
निष्कर्ष: क्षमा और करुणा का शाश्वत संदेश
संत एकनाथ का जीवन हमें यह सिखाता है कि आध्यात्मिक उन्नति का पैमाना यह नहीं है कि आपने कितने ग्रंथ पढ़े हैं या कितनी मालाएं फेरी हैं; असली पैमाना यह है कि आपके दिल में दूसरों के दुखों के प्रति कितनी दया है और आप अपमान करने वाले को कितनी सहजता से क्षमा कर सकते हैं।
आज जब दुनिया में असहिष्णुता, क्रोध और जातिगत नफरत बढ़ रही है, संत एकनाथ का यह अमर आदर्श हम सभी का मार्गदर्शन करता है कि — “भूते परस्परें जडो जीवांचे प्रेम” (समस्त प्राणियों के बीच केवल और केवल निस्वार्थ प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है)।





