मिलारेपा की कहानी — तिब्बत के महान योगी की गाथा

आध्यात्मिक इतिहास में ऐसी बहुत कम कहानियां मिलती हैं जो इंसान के रोंगटे खड़े कर दें और उसकी आत्मा को झकझोर कर रख दें। आमतौर पर हम संतों की जो कहानियां सुनते हैं, उनमें वे बचपन से ही बड़े शांत, ज्ञानी और पवित्र होते हैं। लेकिन तिब्बत के महानतम योगी मिलारेपा (Jetsun Milarepa, 1052–1135 ई.) की गाथा बिल्कुल अलग और चौंकाने वाली है।

मिलारेपा अपने जीवन के पहले हिस्से में कोई संत नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे तांत्रिक थे जिन्होंने बदले की आग में जलकर काले जादू (Black Magic) से अपने ही कुल के 35 लोगों की जान ले ली थी और पूरे गांव की फसलें बर्बाद कर दी थीं। लेकिन इसके बाद जब उनके भीतर पश्चाताप की ज्वाला जगी, तो उन्होंने अपने पापों को धोने के लिए ऐसी कठोर तपस्या की जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में नहीं मिलती। उन्होंने हिमालय की बर्फीली गुफाओं में बिना कपड़ों के, केवल बिच्छू-घास (कंडली) का सूप पीकर वर्षों बिताए और उसी एक जन्म में परम ज्ञान (बुद्धत्व) प्राप्त करके अमर हो गए।

मिलारेपा की यह दास्तान हमें सिखाती है कि आपका अतीत चाहे कितना भी अंधकारमय और पापों से भरा क्यों न रहा हो, यदि आपके भीतर सच्चा पश्चाताप, गुरु के प्रति अटूट निष्ठा और साधना का संकल्प हो, तो आप नर्क के द्वार से लौटकर भी परमात्मा को पा सकते हैं। आइए, इस पावन गाथा को बहुत ही सरल, आत्मीय और बोलचाल की हिंदी में विस्तार से जानते हैं।

Table of Contents

बचपन और चाचा-चाची का क्रूर विश्वासघात

मिलारेपा का जन्म 11वीं शताब्दी में पश्चिमी तिब्बत के क्या न्गातसा (Kya Ngatsa) नामक एक सुंदर और समृद्ध गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम मिला शेरब ग्यालत्सेन और माता का नाम न्यंगत्सा कार्ग्येन था। वे एक संपन्न व्यापारी और जमींदार परिवार से थे।

जब बालक का जन्म हुआ, तो पिता व्यापार से बहुत बड़ा धन कमाकर लौटे थे, इसलिए उन्होंने बालक का नाम रखा — थोपागा (Thopaga), जिसका तिब्बती भाषा में अर्थ होता है ‘सुनने में मधुर या प्रिय’। थोपागा की आवाज बचपन से ही बहुत सुरीली थी और उनका बचपन बड़े ही लाड़-प्यार और ऐश्वर्य में बीता। उनकी एक छोटी बहन भी थी जिसका नाम पेता (Peta) था।

पिता की मृत्यु और जीवन का पहला आघात

दुर्भाग्य से जब थोपागा केवल 7 वर्ष के थे, तब उनके पिता एक गंभीर बीमारी की चपेट में आ गए। अपनी मृत्यु को निकट देखकर पिता ने अपने सगे भाई (चाचा) और भाभी (चाची) को बुलाया। पूरे गांव के गणमान्य लोगों के सामने पिता ने वसीयत की:

“मेरी सारी संपत्ति, खेत, पशु, सोना और घर मेरे भाई और भाभी की देखरेख में रहेंगे। लेकिन जब मेरा बेटा थोपागा बड़ा होकर 15 वर्ष का हो जाएगा, तो वे उसकी पूरी पैतृक संपत्ति उसे ससम्मान सौंप देंगे।”

चाचा-चाची की अमानवीय क्रूरता

पिता की आंखें बंद होते ही चाचा और चाची का असली लालची और निर्दयी चेहरा सामने आ गया। उन्होंने सारी संपत्ति, घर और पशुओं पर खुद कब्जा कर लिया। बालक थोपागा, उसकी मां और छोटी बहन को घर के सबसे गंदे कोने में फेंक दिया गया और उनके साथ दासों से भी बदतर व्यवहार किया जाने लगा।

  • गर्मियों में उन्हें कड़ी धूप में खेतों में बेगार करनी पड़ती थी और सर्दियों में बिना गर्म कपड़ों के बर्फ में काम करना पड़ता था।
  • उन्हें खाने के लिए जानवरों का बचा हुआ जूठा भोजन दिया जाता था।
  • उनके शरीर पर फटे हुए चीथड़े लटकते थे और उनके सिर जुओं से भर गए थे। जो बालक कल तक रेशम पहनता था, वह आज एक नौकर बन चुका था।

जब मां को भरी सभा में पीटा गया

जब थोपागा 15 वर्ष के हुए, तो उनकी मां ने अपने रिश्तेदारों और गांव के बुजुर्गों को एक दावत पर बुलाया। मां ने बड़ी उम्मीद से चाचा-चाची से कहा, “अब मेरा बेटा बड़ा हो गया है, कृपया मेरे पति की वसीयत के अनुसार हमारी संपत्ति हमें लौटा दीजिए ताकि हम अपना जीवन चला सकें।”

यह सुनते ही चाचा और चाची गुस्से से लाल हो गए। चाचा ने चिल्लाकर कहा, “कैसी संपत्ति? तुम्हारे पति का तो हम पर बहुत बड़ा कर्ज था! जो कुछ यहां है, वह सब हमारा है। अगर तुम्हें यहां रहना है तो नौकर बनकर रहो, वरना इस गांव से दफा हो जाओ!” चाची ने आगे बढ़कर थोपागा की बेबस मां को थप्पड़ मारे और घसीटते हुए घर से बाहर फेंक दिया। कोई भी रिश्तेदार उस गरीब और लाचार परिवार के पक्ष में बोलने की हिम्मत नहीं जुटा सका।

मां का भयंकर प्रतिशोध और काले जादू का मार्ग

उस दिन भरी सभा में हुए इस अपमान ने मां के दिल में प्रतिशोध (बदले) की ऐसी भयानक आग जला दी जो कभी बुझने वाली नहीं थी। मां ने रात को थोपागा को अपने पास बुलाया। उसकी आंखों में खून उतर आया था। उसने अपने बेटे का हाथ पकड़कर कांपती आवाज में कहा:

“बेटा थोपागा! यदि तुम अपने पिता का असली खून हो, तो तुम्हें किसी बड़े तांत्रिक के पास जाकर काले जादू (Black Magic) और विनाशकारी तंत्र की विद्या सीखनी होगी। तुम्हें उन दुष्टों का सर्वनाश करना होगा जिन्होंने हमारी जिंदगी नरक बना दी। याद रखना, यदि तुम इस बदले को लिए बिना वापस आए, तो मैं इसी चौखट पर अपना सिर पटक कर आत्महत्या कर लूंगी!”

मां के इस असहनीय दर्द और संकल्प को देखकर 16 वर्ष का किशोर थोपागा घर छोड़कर मध्य तिब्बत की ओर निकल पड़ा। वहाँ वे युंगतुन ट्रो ग्याल (Yungtun Trogyal) नामक एक भयंकर तांत्रिक लामा के आश्रम पहुंचे, जो विनाशकारी तंत्र और ओलावृष्टि (Hailstorms) कराने की विद्या में माहिर थे।

थोपागा ने पूरे समर्पण के साथ रात-दिन उस तांत्रिक की सेवा की। जब गुरु ने देखा कि इस बालक के भीतर प्रतिशोध की तीव्र आग है, तो उन्होंने उसे पाताल-लोक और काली शक्तियों को जाग्रत करने वाले अत्यंत गुप्त और मारक मंत्रों की दीक्षा दे दी।

विनाश की रात: 35 लोगों की मौत और ओलों का तांडव

विद्या सिद्ध करने के बाद थोपागा अपने गांव से दूर एक गुप्त गुफा में बैठे और उन्होंने अपने चाचा के परिवार के विनाश के लिए भयंकर तांत्रिक अनुष्ठान शुरू किया।

संयोग से उसी दिन गांव में चाचा के सबसे बड़े बेटे का विवाह था। चाचा के दो मंजिला बड़े मकान में गांव के तमाम रिश्तेदार, दोस्त और वे सभी लोग इकट्ठा थे जिन्होंने कभी थोपागा और उसकी मां का उपहास उड़ाया था। घर में संगीत बज रहा था, शराब के दौर चल रहे थे और लोग उत्सव मना रहे थे।

अचानक आसमान में काले-काले डरावने बादल घिर आए। हवा में एक भयानक सन्नाटा छा गया। थोपागा के तांत्रिक मंत्रों के प्रभाव से मकान के नीचे बंधे हुए घोड़ों और खच्चरों में अचानक पागलपन छा गया। वे पागलों की तरह रस्सियां तोड़कर घर के मुख्य खंभों से टकराने लगे। कुछ ही पलों में घर के खंभे टूट गए और वह भारी-भरकम दो मंजिला मकान पत्थरों के मलबे के साथ भरभराकर गिर पड़ा।

उस मलबे में दबकर चाचा के बेटे, बहू और 35 सगे रिश्तेदारों की दर्दनाक मौत हो गई। चारों तरफ केवल चीख-पुकार और लाशों के ढेर थे। केवल चाचा और चाची किसी काम से उस समय घर से बाहर खड़े थे, इसलिए वे जीवित बच गए।

फसलों पर ओलों का कहर

जब गांव वालों को पता चला कि यह विनाश थोपागा के काले जादू से हुआ है, तो वे क्रोधित होकर उसकी मां को मारने के लिए दौड़े। मां ने तुरंत अपने बेटे को संदेश भेजा कि गांव वाले हमला करने आ रहे हैं।

थोपागा ने तुरंत दूसरा तांत्रिक प्रयोग किया। जब गांव की साल भर की जौ और गेहूं की फसल पककर कटने ही वाली थी, तब आसमान से खरबूजे के आकार के भारी-भारी ओले बरसे। कुछ ही मिनटों में पूरे गांव की फसलें जमीन में मिलकर नष्ट हो गईं। गांव में भुखमरी फैल गई। बदला पूरा हो चुका था, लेकिन इस बदले ने मिलारेपा की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया।

भीषण पश्चाताप और अवीचि नर्क का भय

जब बदले की आग ठंडी हुई, तो थोपागा के दिल में एक भयानक खालीपन और अपराध-बोध (Guilt) पैदा हुआ। रात को जब वे आंखें बंद करते, तो उन्हें उन 35 मरते हुए लोगों की चीखें, उनके फटे हुए सिर और खून से लथपथ लाशें दिखाई देती थीं।

उन्हें अहसास हुआ कि क्रोध और बदले में उन्होंने कितना अक्षम्य महापाप कर दिया है। बौद्ध धर्म के कर्म-सिद्धांत के अनुसार, 35 निर्दोष लोगों की जान लेने और सैकड़ों लोगों को भूखा मारने का एक ही परिणाम था — ‘अवीचि नर्क’ (Avici Hell), जहाँ आत्मा को कल्पों तक असहनीय यातनाएं भुगतनी पड़ती हैं।

थोपागा का खाना-पीना और सोना बंद हो गया। वे रोते हुए अपने तांत्रिक गुरु के चरणों में गिर पड़े और बोले, “गुरुदेव! मुझे अब इस दुनिया में कुछ नहीं चाहिए। मैंने जो पाप किया है, उसकी ज्वाला मुझे रात-दिन जला रही है। कृपया मुझे कोई ऐसा मार्ग बताइए जिससे मेरे पाप कट सकें और मुझे मुक्ति मिल सके, वरना मैं जीवित ही पागल हो जाऊंगा।”

तांत्रिक गुरु ने गहरी सांस ली और कहा, “वत्स! मैंने तुम्हें मारण-विद्या तो सिखा दी, लेकिन मेरे पास पापों को धोने और मोक्ष दिलाने का ज्ञान नहीं है। यदि तुम्हें सचमुच मुक्ति चाहिए, तो तुम दक्षिण तिब्बत के ल्होद्रक जाओ। वहाँ मारपा लोत्सावा (Marpa the Translator) रहते हैं, जो भारत से भगवान बुद्ध का सीधा ज्ञान और महामुद्रा की साधना लेकर आए हैं। केवल वही तुम्हें इस नर्क से बचा सकते हैं।”

गुरु मारपा से मिलन और पत्थरों की ऐतिहासिक परीक्षा

जब थोपागा मारपा के आश्रम पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि एक हट्टे-कट्टे, तेजवान किसान अपने खेत की जुताई कर रहे हैं। वे कोई और नहीं, साक्षात गुरु मारपा ही थे। मारपा एक दिव्यदर्शी सिद्ध महापुरुष थे। उन्होंने ध्यान में पहले ही देख लिया था कि उनके पास एक ऐसा शिष्य आ रहा है जिसके पिछले कर्म बहुत काले हैं, लेकिन जिसके भीतर एक महान ‘बुद्ध’ बनने की पूरी क्षमता है।

मारपा जानते थे कि जब तक थोपागा के संचित पाप और उसका अहंकार पूरी तरह जलकर राख नहीं हो जाते, तब तक उसे कोई भी आध्यात्मिक दीक्षा देना व्यर्थ होगा। इसलिए मारपा ने उसके साथ ऐसा कठोर व्यवहार शुरू किया जिसे देखकर कोई भी आम इंसान भाग खड़ा होता।

मीनारें बनवाना और तुड़वाना: पापों का प्रक्षालन

जब थोपागा ने मारपा से धर्म-उपदेश और दीक्षा मांगी, तो मारपा ने कहा, “तुमने इतने सारे लोगों की हत्या की है और तुम इतनी आसानी से ज्ञान चाहते हो? पहले मेरे लिए एक पत्थरों की मीनार बनाओ, तभी मैं तुम्हें दीक्षा दूंगा।”

दिशा / आकार कठोर परिश्रम गुरु का कठोर आदेश
पूर्वी दिशा (गोल मीनार) पहाड़ों से भारी-भारी पत्थर अपनी नंगी पीठ पर ढोकर लाए और आधी मीनार खड़ी की। मारपा ने कहा: “यह ठीक नहीं बनी, इसे तुरंत तोड़ो और सारे पत्थर वापस उसी पहाड़ पर रख कर आओ!”
पश्चिमी दिशा (अर्धचंद्राकार) दोबारा खून-पसीना बहाकर महीनों में अर्धचंद्राकार भवन बनाया। मारपा ने फिर डांटा: “मैंने ऐसा कब कहा था? इसे भी तोड़ो और मलबा साफ करो।”
उत्तरी दिशा (त्रिकोणीय भवन) तीसरी बार त्रिकोणीय मीनार बनाई। पीठ की चमड़ी छिल गई, घावों में कीड़े पड़ने लगे। मारपा ने लात मारकर उसे गिराने का आदेश दिया और कहा कि तुम अभी तक अहंकार से मुक्त नहीं हुए हो।
अंतिम 9-मंजिला मीनार अत्यंत गंभीर शारीरिक कष्टों के बीच 9 मंजिला ऐतिहासिक मीनार का निर्माण किया। यह मीनार आज भी तिब्बत में ‘सेखर गुथोक’ (Sekhar Guthok) के नाम से खड़ी है।

इस दौरान मारपा ने कभी मिलारेपा से मीठा शब्द नहीं बोला। जब भी दीक्षा की सभा होती, मारपा मिलारेपा को धक्का देकर, गालियां देकर सभा से बाहर निकाल देते थे। मिलारेपा रात-रात भर रोते थे, उनकी पीठ पर इतने गहरे घाव हो चुके थे कि वे सीधे लेट भी नहीं सकते थे। लेकिन उनके मन में गुरु के प्रति कभी एक क्षण के लिए भी अविश्वास या द्वेष पैदा नहीं हुआ। वे सोचते थे कि यह सब मेरे ही भयानक पापों की सजा है।

परम दीक्षा और मारपा के आंसू

जब मिलारेपा की सहनशीलता अपनी अंतिम सीमा पर पहुंच गई और वे आत्महत्या करने का विचार करने लगे, तब गुरु मारपा ने उन्हें अपने कमरे में बुलाया।

उस दिन मारपा की आंखों में आंसू बह रहे थे। उन्होंने दौड़कर मिलारेपा को अपने सीने से लगा लिया। मारपा ने रुंधे गले से कहा:

“वत्स थोपागा! तुम धन्य हो। यदि मैंने तुम्हारे साथ यह कठोरता न की होती, तो तुम्हारे पिछले जन्मों के और इस जन्म के भयानक पाप कभी नष्ट नहीं होते। तुमने जो शारीरिक और मानसिक कष्ट सहे हैं, उससे तुम्हारे 90% पाप जलकर राख हो चुके हैं। तुमने गुरु-भक्ति की जो परीक्षा दी है, वैसी परीक्षा संसार का कोई शिष्य नहीं दे सकता। अब तुम साक्षात ज्ञान के अधिकारी बन चुके हो।”

मारपा ने मिलारेपा को विधिवत बौद्ध संन्यास और गुप्त तांत्रिक साधनाओं की दीक्षा दी। उन्होंने मिलारेपा को नाम दिया — मिला दोर्जे ग्यालत्सेन (Mila Dorje Gyaltsen)। मारपा ने उन्हें चक्रसंवर तंत्र, महामुद्रा और सबसे महत्वपूर्ण ‘तुम्मो’ (Tummo – आंतरिक अग्नि योग) की गोपनीय विद्या सिखाई।

हिमालय की बर्फीली गुफाओं में तपस्या और बिच्छू-घास का आहार

दीक्षा प्राप्त करने के बाद मिलारेपा ने गुरु की आज्ञा से सांसारिक दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। वे हिमालय की सबसे ऊंची और वीरान बर्फीली गुफाओं में साधना करने चले गए — जैसे ड्रैगकर तासो (सफेद चट्टान की गुफा) और लाप्ची कांग।

‘तुम्मो योग’: बर्फ में भी पसीने छुड़ाने वाली आंतरिक अग्नि

हिमालय की 15,000 से 18,000 फीट ऊंची इन गुफाओं में सर्दियों में तापमान शून्य से 20-30 डिग्री नीचे चला जाता था। वहाँ आम इंसान 10 मिनट में जमकर मर सकता है। लेकिन मिलारेपा ने ‘तुम्मो योग’ को पूरी तरह सिद्ध कर लिया था।

तुम्मो योग में प्राण-वायु को नाभि चक्र पर केंद्रित करके एक ऐसी आंतरिक आध्यात्मिक अग्नि प्रज्वलित की जाती है, जिससे शरीर में असीम गर्मी पैदा होती है। कड़ाके की बर्फीली हवाओं में भी मिलारेपा केवल एक सफेद सूती कपड़ा (cotton cloth) ओढ़कर बैठते थे। उनके शरीर से इतनी प्रचंड ऊर्जा निकलती थी कि उनके चारों तरफ की बर्फ पिघलकर बहने लगती थी। इसी सूती कपड़े को तिब्बती में ‘रेपा’ (Repa) कहा जाता है, जिससे उनका नाम हमेशा के लिए मिलारेपा (Milarepa – सूती वस्त्र धारण करने वाला योगी) पड़ गया।

सालों तक केवल बिच्छू-घास (कंडली) का भोजन

गुफा में कुछ महीनों बाद मिलारेपा का आटा और सूखा भोजन पूरी तरह समाप्त हो गया। आस-पास मीलों तक कोई बस्ती नहीं थी। गुफा के बाहर केवल जंगली बिच्छू-घास (Stinging Nettles) उगती थी, जिसे छूने मात्र से तेज जलन और छाले पड़ जाते हैं।

भूख से बचने के लिए मिलारेपा ने उसी कड़वी और कांटेदार बिच्छू-घास को पानी में उबालकर पीना शुरू किया। उन्होंने नमक, तेल या किसी अन्य मसाले के बिना, लगातार कई वर्षों तक केवल उसी घास का सूप पिया।

  • सालों तक केवल हरी घास खाने के कारण मिलारेपा का पूरा शरीर हरा हो गया।
  • उनकी त्वचा, बाल और नाखून सब हरे रंग के हो गए।
  • उनका शरीर इतना दुबला हो गया कि केवल हड्डियों का ढांचा दिखाई देता था। दूर से देखने पर वे किसी कंकाल या प्रेत जैसे दिखते थे।
  • जब कभी शिकारी या ग्रामीण उस गुफा के पास से गुजरते, तो वे डरकर भाग जाते थे कि कोई भूत बैठा है। लेकिन मिलारेपा का मन परमात्मा के परम आनंद और समाधि में ऐसा लीन था कि उन्हें अपने शरीर का कोई होश ही नहीं था।

पूर्ण बुद्धत्व और अलौकिक सिद्धियां

वर्षों की इस अमानवीय तपस्या के बाद एक दिन मिलारेपा के भीतर ज्ञान का अंतिम सूर्योदय हुआ। उनके मन की सारी ग्रंथियां खुल गईं और उन्होंने ‘महामुद्रा’ (The Great Seal of Enlightenment) की सर्वोच्च अवस्था को प्राप्त कर लिया। वे एक सामान्य पापी मनुष्य से सीधे ‘बुद्ध’ (Enlightened One) बन गए।

आत्म-साक्षात्कार के बाद उनके भीतर कई अलौकिक सिद्धियां जाग्रत हुईं:

  • आकाश-गमन: वे पक्षियों की तरह आकाश में उड़कर एक पर्वत से दूसरे पर्वत पर चले जाते थे।
  • पद-चिह्न छोड़ना: आज भी नेपाल और तिब्बत की कई गुफाओं में ठोस ग्रेनाइट पत्थरों पर मिलारेपा के पैरों और हाथों के निशान बने हुए हैं, जो उन्होंने पत्थरों को मक्खन की तरह पिघलाकर बनाए थे।
  • शम्बाला और ज्ञानगंज से संपर्क: माना जाता है कि मिलारेपा का संपर्क हिमालय के अमर सिद्धों और शम्बाला (ज्ञानगंज) की गुप्त परंपरा से निरंतर बना रहता था।

मिलारेपा के ‘सौ हजार गीत’ (The Hundred Thousand Songs)

मिलारेपा ने कभी कोई औपचारिक ग्रंथ या पोथी नहीं लिखी। वे जब भी अपने शिष्यों, ग्रामीणों या विरोधियों से मिलते, तो अपनी बात भाषण देकर नहीं, बल्कि सहज, सुंदर और मार्मिक गीतों (दोहों) के माध्यम से गाकर सुनाते थे।

तिब्बती साहित्य में उनके इन गीतों का संग्रह ‘मिलारेपा के सौ हजार गीत’ (Mila Grubum / The Hundred Thousand Songs of Milarepa) के नाम से दुनिया भर में विख्यात है। उनके गीतों की कुछ प्रमुख शिक्षाएं इस प्रकार हैं:

“यह जीवन पानी के बुलबुले जैसा नश्वर है। मृत्यु कब तुम्हारे दरवाजे पर दस्तक दे देगी, कोई नहीं जानता। इसलिए सांसारिक धन और दिखावे के पीछे मत भागो, अपने मन को अभी इसी क्षण परमात्मा के ध्यान में लगाओ।”

वे गाते थे कि यदि मन में वासना और लोभ भरा है, तो गुफा में बैठना भी व्यर्थ है; और यदि मन शुद्ध और शांत है, तो सारा संसार ही एक पावन मंदिर है।

मिलारेपा का महापरिनिर्वाण: अंतिम परीक्षा

जब मिलारेपा 84 वर्ष के हुए, तो पूरे तिब्बत में उनकी ख्याति एक साक्षात बुद्ध की तरह फैल चुकी थी। लेकिन जहाँ प्रकाश होता है, वहाँ अंधकार भी ईर्ष्या करता है। एक समृद्ध और अहंकारी लामा (गेशे त्साकपुवा) मिलारेपा की लोकप्रियता से बहुत जलता था।

उस ईर्ष्यालु लामा ने अपनी एक प्रेमिका के माध्यम से जहर मिली हुई दही (दही में विष मिलाकर) मिलारेपा के पास भिजवाई। मिलारेपा अंतर्यामी थे। उन्होंने दही देखते ही जान लिया कि इसमें हलाहल विष है। लेकिन उन्होंने उस महिला से कहा, “मैं जानता हूं कि इसमें विष है, लेकिन यदि मैं इसे नहीं पीऊंगा तो उस लामा को पश्चाताप का अवसर नहीं मिलेगा और तुम्हारे कर्म बंध जाएंगे।”

मिलारेपा ने मुस्कुराते हुए वह पूरा विषैला दही पी लिया। विष के प्रभाव से उनका शरीर धीरे-धीरे शांत होने लगा। जब उस लामा को पता चला कि मिलारेपा सब कुछ जानते हुए भी विष पी गए, तो वह रोता हुआ उनके चरणों में गिर पड़ा और उसने सन्यास ले लिया।

संवत 1135 में, चोबार की पावन भूमि पर मिलारेपा ने महापरिनिर्वाण (देह-त्याग) प्राप्त किया। उस समय पूरे आकाश में बिना बादलों के दिव्य इंद्रधनुष छा गए, देवताओं ने फूलों की वर्षा की और चारों दिशाओं में दिव्य संगीत गूंज उठा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. मिलारेपा का असली नाम क्या था और उन्हें ‘रेपा’ क्यों कहा जाता है?

मिलारेपा के बचपन का नाम ‘थोपागा’ था, जिसका अर्थ है सुनने में प्रिय। बाद में जब उन्होंने हिमालय की बर्फीली गुफाओं में तुम्मो योग की सिद्धि प्राप्त की और भीषण ठंड में भी केवल एक सफेद सूती वस्त्र (तिब्बती में ‘रेपा’) पहनकर रहने लगे, तब उनका नाम ‘मिलारेपा’ (मिला वंश का सूती वस्त्रधारी योगी) पड़ा।

2. क्या मिलारेपा ने सचमुच काले जादू से 35 लोगों की हत्या की थी?

हाँ, यह ऐतिहासिक और प्रामाणिक तथ्य है। युवावस्था में अपने चाचा-चाची द्वारा अपनी मां, बहन और पैतृक संपत्ति पर किए गए क्रूर अत्याचारों का बदला लेने के लिए उन्होंने तांत्रिक लामा से विनाशकारी जादू सीखकर अपने 35 सगे संबंधियों का घर गिराकर वध किया था। बाद में इसी महापाप के पश्चाताप ने उन्हें मुक्ति के मार्ग पर धकेला।

3. गुरु मारपा ने मिलारेपा से बार-बार पत्थर की मीनारें क्यों बनवाईं और तुड़वाईं?

गुरु मारपा कोई क्रूर व्यक्ति नहीं थे, बल्कि वे जानते थे कि मिलारेपा के संचित पाप अत्यंत भारी हैं। यदि उन पापों को शारीरिक तपस्या और अहंकार के पूर्ण विसर्जन द्वारा नहीं जलाया जाता, तो मिलारेपा कभी उच्च साधना के योग्य नहीं बन पाते। मीनारें बनवाने और तुड़वाने से मिलारेपा का अहंकार, क्रोध और पाप पूरी तरह भस्म हो गए।

4. ‘तुम्मो योग’ क्या है जिसे मिलारेपा ने सिद्ध किया था?

तुम्मो (Tummo) तिब्बती बौद्ध तंत्र की एक अत्यंत गुप्त योगिक क्रिया है, जिसमें प्राणायाम और मानसिक एकाग्रता द्वारा नाभि चक्र में आंतरिक प्राणिक अग्नि प्रज्वलित की जाती है। इस साधना के सिद्ध होने पर योगी माइनस 30 डिग्री तापमान में भी बिना कपड़ों के आसानी से रह सकता है और उसके शरीर से प्रचंड ताप निकलता है।

5. मिलारेपा की कहानी से आज के इंसान को क्या सीख मिलती है?

मिलारेपा का जीवन सिखाता है कि कोई भी व्यक्ति अपने अतीत का कैदी नहीं है। चाहे आपने जीवन में कितनी भी गलतियां या पाप किए हों, यदि आप सच्चे दिल से पश्चाताप करें, गुरु की शरण में जाएं और साधना का मार्ग अपनाएं, तो आपका जीवन पूरी तरह रूपांतरित हो सकता है।

निष्कर्ष: पाप से परम ज्ञान तक का अमर प्रकाश-स्तंभ

मिलारेपा की कहानी केवल एक प्राचीन कथा नहीं है, बल्कि यह हर उस इंसान के लिए आशा की एक बहुत बड़ी किरण है जो अपने अतीत की गलतियों, अपराध-बोध और निराशा के बोझ तले दबा हुआ है।

वे हमें सिखाते हैं कि साधना कोई फूलों की सेज नहीं है, इसके लिए अपने अहंकार को पत्थरों की तरह तोड़ना पड़ता है और अपनी वासनाओं को बिच्छू-घास की तरह चबाना पड़ता है। आज भी जब हिमालय की बर्फीली हवाएं लाप्ची और कैलाश की चोटियों से टकराती हैं, तो ऐसा लगता है मानो मिलारेपा की सुरीली आवाज आज भी गूंज रही हो — “उठो, जागो, यह जीवन क्षणभंगुर है, अपने मन को पहचानो और बुद्ध बनो!”

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