प्रेमानंद जी महाराज — जीवन, वैराग्य और शिक्षाएँ

आज के दौर में जब हर तरफ भागदौड़, तनाव, सोशल मीडिया का दिखावा और मानसिक अशांति फैली हुई है, तब वृंदावन की पावन गलियों से एक ऐसी दिव्य आवाज गूंजती है जो करोड़ों लोगों के दिलों को सीधे छू लेती है। यह आवाज है पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज (Pujya Shri Premanand Ji Maharaj) की। उनके चेहरे पर वह अलौकिक तेज, होठों पर हमेशा तैरती प्यारी सी मुस्कान और आंखों में राधा नाम का अटूट प्रेम देखकर कोई भी व्यक्ति क्षण भर में अपने सारे दुख-दर्द भूल जाता है।

आज देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया से लाखों लोग, जिनमें आम भक्त से लेकर बड़े-बड़े उद्योगपति, क्रिकेटर जैसे विराट कोहली और अनुष्का शर्मा, फिल्म स्टार्स और उच्च अधिकारी शामिल हैं, उनके सिर्फ एक दर्शन के लिए रात के 2-3 बजे वृंदावन की ठंडी और संकरी गलियों में घंटों खड़े रहते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस संत के दर्शन मात्र से लोगों के जीवन की दिशा बदल जाती है, उनका अपना जीवन कितना संघर्षमय, वैराग्यपूर्ण और कठोर तपस्या से भरा रहा है? पिछले करीब 20 वर्षों से उनकी दोनों किडनियां पूरी तरह फेल हैं, फिर भी वे हर दिन 18-20 घंटे साधना, परिक्रमा और भक्तों के कल्याण में बिताते हैं।

इस विस्तृत लेख में हम पूज्य प्रेमानंद जी महाराज के जन्म, बचपन के वैराग्य, गंगा किनारे की कठोर तपस्या, वृंदावन आगमन, दोनों किडनियां खराब होने के बाद भी उनकी अटूट साधना, उनकी दिनचर्या, और आज के युवाओं के लिए उनके दिए गए अनमोल जीवन-उपदेशों को बहुत ही सरल, आत्मीय और बोलचाल की हिंदी में समझेंगे।

Table of Contents

प्रारंभिक जीवन और बचपन में वैराग्य का अंकुर

पूज्य प्रेमानंद जी महाराज का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के सरसौल नामक एक छोटे और शांत गांव में एक अत्यंत सात्विक, धर्मनिष्ठ और कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता जी का नाम श्री शंभू पांडे और माता जी का नाम श्रीमती रमा देवी था। परिवार में शुरू से ही भगवान शिव और भगवती की पूजा-अर्चना का वातावरण था, जिसके संस्कार बालक के मन पर गहरे पड़े।

महाराज जी के बचपन का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। बचपन से ही उनका स्वभाव अन्य बच्चों की तुलना में बिल्कुल अलग था। जहां उम्र के बाकी बच्चे गली-मोहल्ले में खेलकूद, खिलौनों और मौज-मस्ती में अपना समय बिताते थे, वहीं बालक अनिरुद्ध अक्सर शांत और एकांत में बैठ जाते थे। वे अक्सर सोचते कि यह संसार क्या है? हम यहां क्यों आए हैं? यदि एक दिन सबको मर ही जाना है, तो फिर इस संसार की भागदौड़ और पढ़ाई-लिखाई का अंतिम लक्ष्य क्या है?

जब वे केवल 10-12 वर्ष के थे, तभी उन्होंने ‘श्री सुखसागर’ और भगवद्गीता जैसे ग्रंथों को पढ़ना शुरू कर दिया था। भगवान के अस्तित्व और जीवन के अंतिम सत्य की खोज उनके मन में इतनी तीव्र हो गई कि सांसारिक रिश्ते-नाते उन्हें बंधन जैसे लगने लगे।

13 वर्ष की अल्पायु में घर-त्याग: सत्य की खोज में संन्यास

जब बालक अनिरुद्ध कक्षा 8 में पढ़ रहे थे, तब उनके भीतर वैराग्य की ज्वाला पूरी तरह भड़क उठी। उन्हें लगा कि यदि वे घर-गृहस्थी और दुनियादारी के चक्रव्यूह में उलझ गए, तो भगवान को पाने का उनका लक्ष्य कभी पूरा नहीं हो सकेगा।

एक रात, जब घर के सभी लोग गहरी नींद में सो रहे थे, 13 वर्ष के इस बालक ने चुपचाप अपने बिस्तर से उठकर भगवान के चरणों का ध्यान किया। वे बिना किसी को बताए, बिना एक भी पैसा या अतिरिक्त कपड़ा लिए, चुपचाप घर की देहरी लांघकर अज्ञात पथ पर निकल पड़े। अपने माता-पिता और सुख-सुविधाओं का त्याग कर वे सीधे सत्य की खोज में निकल पड़े।

घर छोड़ने के बाद वे सीधे पावन नगरी वाराणसी (काशी) पहुंचे। काशी में गंगा मैया के तट पर उन्होंने नैष्ठिक ब्रह्मचर्य का संकल्प लिया। वहां उन्हें पूज्य स्वामी गौरंगी शरण जी महाराज का सानिध्य मिला और उन्होंने ‘आनंदस्वरूप ब्रह्मचारी’ के रूप में जीवन शुरू किया। बाद में संन्यास की विधिवत दीक्षा लेकर वे स्वामी आनंदस्वरूप बने।

गंगा तट पर कठोर साधना: अयाचक वृत्ति और तीन बार स्नान

काशी में महाराज जी का जीवन किसी भी आम इंसान की कल्पना से परे था। उन्होंने गंगा तट पर वर्षों तक ऐसी कठोर तपस्या की जिसे सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं:

  • अयाचक वृत्ति का कठोर नियम: महाराज जी ने नियम लिया था कि वे कभी किसी से भोजन नहीं मांगेंगे। चाहे कितनी भी भूख क्यों न लगी हो, वे किसी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे। यदि कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से, बिना मांगे, जो कुछ भी लाकर दे देगा, वे केवल उसी को भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण करेंगे। कई-कई दिन ऐसे बीत जाते थे जब उन्हें अन्न का एक दाना भी नहीं मिलता था, और वे केवल गंगा जल पीकर दिन गुजारते थे।
  • त्रिकाल गंगा स्नान: सर्दी हो, गर्मी हो या मूसलाधार बारिश, महाराज जी दिन में तीन बार गंगा जी में स्नान करते थे। कड़ाके की ठंड में जब लोग रजाई से बाहर नहीं निकलते, वे गंगा के बर्फीले पानी में खड़े होकर घंटों गायत्री मंत्र और ईश्वर का ध्यान करते थे।
  • अद्वैत वेदांत और ज्ञान मार्ग: इस दौरान वे अद्वैत वेदांत के गहन चिंतन में डूबे रहते थे। वे ‘अहं ब्रह्मास्मि’ और ‘तत्वमसि’ के भाव में स्थित होकर घंटों समाधि में लीन रहते थे। उनका पूरा जीवन ज्ञान, वैराग्य और आत्म-साक्षात्कार को समर्पित था।

जीवन का सबसे बड़ा मोड़: काशी से वृंदावन की ओर

यद्यपि महाराज जी ज्ञान मार्ग और अद्वैत वेदांत की गहराइयों में डूबे हुए थे, लेकिन नियति को उनसे कुछ और ही महान कार्य कराना था। भगवान की लीला बड़ी विचित्र होती है। एक दिन काशी में गंगा किनारे ध्यान में बैठे हुए उनके कानों में एक बंगाली संत द्वारा गाए जा रहे श्री चैतन्य महाप्रभु के पदों और श्री राधा नाम की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ी।

उस मधुर नाम ने उनके हृदय के किसी बहुत गहरे कोने को झकझोर दिया। जिस हृदय में अब तक कठोर वैराग्य और निर्गुण-निराकार ब्रह्म का चिंतन था, वहां अचानक एक दिव्य प्रेम, एक तड़प और श्री राधा रानी के दर्शन की तीव्र लालसा जाग उठी। उन्हें लगा कि ज्ञान अपनी जगह सत्य है, लेकिन जो आनंद और माधुर्य भगवान के प्रेम और उनके नाम-संकीर्तन में है, वह अद्वितीय है।

इस अनुभूति के बाद वे काशी छोड़कर सीधे भगवान श्री कृष्ण और श्री राधा रानी की लीला-स्थली वृंदावन धाम आ गए। वृंदावन की रज (धूल) में कदम रखते ही उनका रोम-रोम पुलकित हो उठा। उन्होंने महसूस किया कि यही वह भूमि है जहां उनकी आत्मा को शाश्वत शांति मिल सकती है।

राधावल्लभ संप्रदाय में प्रवेश और ‘प्रेमानंद’ नाम की प्राप्ति

वृंदावन आकर महाराज जी ने पूज्य श्री मोहित मराल गोस्वामी जी की शरण ली, जो राधावल्लभ संप्रदाय के परम पूज्य आचार्य थे। गोस्वामी जी ने बालक के भीतर छिपे अगाध प्रेम और वैराग्य को पहचान लिया। उन्होंने महाराज जी को शरणागति मंत्र की दीक्षा दी और उन्हें नाम दिया — प्रेमानंद।

राधावल्लभ संप्रदाय में दीक्षित होने के बाद महाराज जी पूरी तरह से ‘रस-उपासना’ और ‘हित साधना’ में रंग गए। श्री हित हरिवंश महाप्रभु की वाणी और श्री राधा केलि कुंज के भाव में वे रात-दिन डूब गए। उन्होंने अपना पूरा अस्तित्व श्री राधा रानी के चरणों में समर्पित कर दिया। उनका यह स्पष्ट मानना है कि श्री कृष्ण को पाने का सबसे सरल, सबसे मीठा और सबसे सुरक्षित मार्ग केवल और केवल “श्री राधा” नाम की शरण में जाना है।

जब दोनों किडनियां फेल हो गईं: शरीर रोगग्रस्त, लेकिन आत्मा अमर

पूज्य प्रेमानंद जी महाराज के जीवन का यह पहलू हर उस व्यक्ति के लिए एक बहुत बड़ा सबक है जो जीवन में छोटी-मोटी बीमारियों या परेशानियों से घबराकर हिम्मत हार जाता है।

आज से करीब 18-20 वर्ष पहले महाराज जी को ऑटोसोमल डोमिनेंट पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज (ADPKD) नामक एक अत्यंत गंभीर आनुवंशिक बीमारी का पता चला। इस बीमारी में किडनियों में सिस्ट (गांठें) बन जाती हैं और धीरे-धीरे किडनी काम करना बंद कर देती है। कुछ ही समय में उनकी दोनों किडनियां पूरी तरह (100%) खराब हो गईं।

चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, जब किसी इंसान की दोनों किडनियां फेल हो जाती हैं, तो उसके खून में यूरिया और क्रिएटिनिन जैसे जहरीले तत्व तेजी से बढ़ने लगते हैं। ऐसा मरीज अत्यधिक कमजोरी, चक्कर, उल्टी और असहनीय दर्द से जूझता है और सामान्यतः बिस्तर पकड़ लेता है। महाराज जी को हफ्ते में 3 से 4 बार डायलिसिस करवाना पड़ता है, जिसमें शरीर का सारा खून मशीन से साफ होकर वापस शरीर में आता है।

बड़े-बड़े डॉक्टर इस बात को देखकर हैरान हैं कि महाराज जी इस गंभीर शारीरिक अवस्था में भी कैसे रोज घंटों चलते हैं, हजारों लोगों से मिलते हैं और बिना थके घंटों तक सत्संग करते हैं। जब किसी ने उनसे इस बारे में पूछा, तो महाराज जी ने बहुत ही सरलता से उत्तर दिया:

“यह शरीर हमारा नहीं है, यह तो श्री जी (राधा रानी) की अमानत है। जब तक वे इस शरीर से अपनी सेवा लेना चाहेंगी, यह चलेगा। बीमारी शरीर को है, मेरी आत्मा को कोई बीमारी नहीं छू सकती। जब हम मन को भगवान के चरणों में जोड़ देते हैं, तो शरीर के कष्ट अपने आप छोटे लगने लगते हैं।”

महाराज जी की दैनिक दिनचर्या: त्याग और साधना का आदर्श

महाराज जी की दिनचर्या इतनी अनुशासित और कठिन है कि आधुनिक सुख-सुविधाओं में जीने वाला व्यक्ति इसकी कल्पना भी नहीं कर सकता:

समय (अनुमानित) गतिविधि / साधना आध्यात्मिक महत्व
रात 1:30 – 2:00 बजे शैया त्याग और शौच-स्नान ब्रह्ममुहूर्त से भी पहले उठकर आंतरिक शुद्धि और राधा नाम का ध्यान।
रात 2:15 – 3:30 बजे वृंदावन की गलियों में पदयात्रा (दर्शन) सड़क किनारे घंटों से खड़े हजारों भक्तों को दर्शन देते हुए आश्रम की ओर प्रस्थान।
प्रातः 4:00 – 6:00 बजे नाम-संकीर्तन और हित वाणी पाठ श्री राधा केलि कुंज में संतों और भक्तों के साथ प्रिया-प्रियतम की लीलाओं का गायन।
सुबह 6:30 – 9:00 बजे एकांतिक वार्तालाप (Satsang & Q&A) देश-विदेश से आए भक्तों के मानसिक संशय, डिप्रेशन और जीवन की उलझनों का समाधान।
दोपहर का समय डायलिसिस और अल्प विश्राम नियमित चिकित्सा प्रक्रिया, जिसके दौरान भी उनके हाथों में निरंतर माला चलती रहती है।
सायंकाल व रात्रि निजी साधना और चिंतन पूरी तरह एकांत में रहकर श्री जी के चरणों में आत्म-समर्पण।

महाराज जी के मुख्य उपदेश: आज के युवाओं के लिए संजीवनी

पूज्य प्रेमानंद जी महाराज का प्रवचन किसी भारी-भरकम संस्कृत या कठिन दर्शनशास्त्र का प्रदर्शन नहीं होता। वे बहुत ही ठेठ, आम बोलचाल की हिंदी में ऐसी बातें कह जाते हैं जो सीधे दिल में उतर जाती हैं। आइए जानते हैं उनके सबसे महत्वपूर्ण जीवन-उपदेश:

1. राधा नाम जप — कलियुग का सबसे बड़ा संबल

महाराज जी बार-बार कहते हैं कि कलियुग में कठिन योग, यज्ञ या तपस्या करना हर किसी के बस की बात नहीं है। आज के मनुष्य के पास न तो उतना समय है और न ही उतना धैर्य। इसलिए कलियुग में केवल भगवान का नाम ही पार लगाने वाली नौका है। वे कहते हैं कि चलते-फिरते, उठते-बैठते, खाते-पीते और नौकरी-व्यापार करते हुए भी मन ही मन “राधा-राधा” का जाप करते रहो। यह नाम जप आपके सारे पापों को भस्म कर देगा और मन को गंदे विचारों से मुक्त कर देगा।

2. ब्रह्मचर्य और चरित्र की रक्षा — युवाओं के लिए अमृत संदेश

आज का युवा इंटरनेट, सोशल मीडिया, अश्लीलता (Pornography) और वासना के भयंकर भंवर में फंसा हुआ है। महाराज जी इस विषय पर बहुत ही बेबाक और कड़े शब्दों में बोलते हैं। वे कहते हैं:

  • वीर्य और चरित्र की रक्षा ही मनुष्य का असली बल है। जो युवा अपनी काम-वासना पर नियंत्रण नहीं रख सकता, उसका शरीर, बुद्धि और भविष्य तीनों नष्ट हो जाते हैं।
  • यदि आप अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहते हैं, चाहे वह पढ़ाई हो, करियर हो या आध्यात्मिक उन्नति, तो आपको ब्रह्मचर्य का पालन करना ही होगा।
  • लड़के और लड़कियों को केवल शारीरिक आकर्षण के पीछे भागकर अपना अनमोल जीवन बर्बाद नहीं करना चाहिए। सच्चा प्रेम वासना नहीं, त्याग और पवित्रता है।

3. माता-पिता की सेवा ही सबसे बड़ी तीर्थ यात्रा है

महाराज जी उन लोगों को सख्त फटकार लगाते हैं जो अपने बूढ़े माता-पिता को घर में दुखी छोड़कर तीर्थों में संतों के दर्शन करने या दान-पुण्य करने आते हैं। वे कहते हैं कि जिस घर में मां-बाप रो रहे हों, उस घर की कोई भी पूजा भगवान कभी स्वीकार नहीं करते। भगवान से पहले माता-पिता का स्थान है। घर में रहकर अपने माता-पिता की सेवा करना किसी भी मंदिर या आश्रम जाने से हजार गुना बड़ा पुण्य है।

4. सच्चा संन्यास क्या है?

अक्सर लोग सोचते हैं कि भगवा वस्त्र पहन लेना या घर छोड़ देना ही संन्यास है। महाराज जी कहते हैं कि संन्यास कपड़ों का नहीं, बल्कि मन की वासनाओं और आसक्तियों का त्याग है। यदि कोई व्यक्ति अपने घर में रहकर, अपने परिवार की जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाते हुए, झूठ, छल-कपट और लोभ से दूर रहता है और ईश्वर का भजन करता है, तो वह किसी जंगल में रहने वाले साधु से भी बड़ा संन्यासी है।

5. प्रारब्ध को हंसकर काटो

जब भक्त अपने जीवन के दुखों, बीमारियों या नुकसान को लेकर रोते हैं, तो महाराज जी कहते हैं कि सुख और दुख हमारे ही पिछले जन्मों के कर्मों (प्रारब्ध) का फल हैं। जब सुख आता है तो हम नाचते हैं, तो फिर दुख आने पर क्यों रोते हैं? जो भी परिस्थिति भगवान ने दी है, उसे उनका प्रसाद मानकर स्वीकार करो और नए पाप कर्म करने से बचो। अगर आप दुख में भी राधा नाम जपते रहेंगे, तो दुख का पहाड़ भी रुई के फाहे जैसा हल्का हो जाएगा।

‘एकांतिक वार्तालाप’: जहां टूटते दिलों को सहारा मिलता है

प्रेमानंद जी महाराज के आश्रम का सबसे लोकप्रिय और जीवन बदलने वाला कार्यक्रम है — एकांतिक वार्तालाप। इसमें कोई भी आम भक्त, विद्यार्थी या परेशान व्यक्ति सीधे महाराज जी के सामने बैठकर अपने दिल की बात कह सकता है।

लोग वहां आकर अपने गहरे से गहरे पाप, गलतियां, डिप्रेशन, पारिवारिक कलह और आत्महत्या करने तक के विचारों को खुलकर महाराज जी के सामने रख देते हैं। महाराज जी किसी को डांटते या दुत्कारते नहीं हैं। वे एक परम दयालु पिता और सच्चे गुरु की तरह उस व्यक्ति के आंसू पोंछते हैं, उसे समझाते हैं कि गलती हर इंसान से होती है, लेकिन पश्चाताप और राधा नाम की शरण में आने से हर पाप धुल सकता है। यही कारण है कि हजारों युवा जो कभी नशे या डिप्रेशन की दलदल में फंसे थे, आज महाराज जी की कृपा से एक सात्विक, स्वस्थ और सफल जीवन जी रहे हैं।

वीआईपी कल्चर का पूर्ण विरोध: सब एक समान

प्रेमानंद जी महाराज के दरबार की सबसे अद्भुत बात यह है कि वहां कोई वीआईपी कल्चर (VIP Culture) नहीं चलता। चाहे देश का कोई बहुत बड़ा अरबपति हो, फिल्मी सितारा हो, उच्च पदों पर बैठा मंत्री हो या फिर कोई गरीब दिहाड़ी मजदूर — महाराज जी के आश्रम में सब जमीन पर एक ही दरी पर बैठते हैं।

महाराज जी किसी को उसके धन, पद या शोहरत से नहीं तौलते। वे केवल भक्त के हृदय का भाव देखते हैं। कई बार ऐसा हुआ है कि बड़े-बड़े लोग खास सुविधा की उम्मीद लेकर आए, लेकिन आश्रम के नियमों के अनुसार उन्हें भी आम भक्तों की तरह कतार में खड़े होकर ही दर्शन करने पड़े। इस समानता और सादगी ने लोगों के दिलों में उनके प्रति श्रद्धा को और भी गहरा कर दिया है।

आश्रम की जानकारी और दर्शन करने की विधि (Guide for Visitors)

यदि आप भी वृंदावन जाकर पूज्य प्रेमानंद जी महाराज के दर्शन करना चाहते हैं, तो निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखें:

  • आश्रम का नाम: श्री हित राधा केलि कुंज (Shri Hit Radha Keli Kunj)
  • स्थान: रमण रेती, परिक्रमा मार्ग, वराह घाट के पास, वृंदावन, मथुरा, उत्तर प्रदेश – 281121
  • रात्रि पदयात्रा दर्शन: महाराज जी हर रात लगभग 2:00 से 3:00 बजे के बीच अपने निवास से आश्रम की ओर पदयात्रा करते हुए जाते हैं। उस समय सड़क के दोनों ओर खड़े होकर भक्त उनके साक्षात दर्शन कर सकते हैं। इसके लिए किसी पास या टिकट की आवश्यकता नहीं होती।
  • एकांतिक वार्तालाप के नियम: एकांतिक वार्तालाप में बैठने के लिए आश्रम से पूर्व अनुमति (टोकन) लेनी होती है, जिसके नियम समय-समय पर आश्रम प्रबंधन द्वारा तय किए जाते हैं।
  • कोई दान या चढ़ावा नहीं: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि महाराज जी कभी किसी से कोई नकद रुपया, दान या व्यक्तिगत भेंट स्वीकार नहीं करते। आश्रम में कोई दान पेटी नहीं रखी जाती। यदि कोई व्यक्ति महाराज जी के नाम पर पैसे मांगता है, तो वह पूरी तरह फर्जी है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. प्रेमानंद जी महाराज का असली नाम क्या है और उनका जन्म कहाँ हुआ था?

पूज्य प्रेमानंद जी महाराज का संन्यास से पहले का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के सरसौल गांव में एक सात्विक और धार्मिक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।

2. महाराज जी की दोनों किडनियां कब से खराब हैं और वे कैसे जीवित हैं?

महाराज जी को करीब 18-20 साल पहले ‘पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज’ (ADPKD) हुई थी, जिसके कारण उनकी दोनों किडनियां पूरी तरह फेल हो चुकी हैं। वे नियमित रूप से हफ्ते में कई बार डायलिसिस पर रहते हैं। उनका स्वस्थ रहना और इतनी सक्रिय दिनचर्या जीना चिकित्सा जगत के लिए भी एक आश्चर्य है, जिसे भक्त राधा रानी की साक्षात कृपा और उनकी योगिक व आध्यात्मिक शक्ति मानते हैं।

3. क्या महाराज जी से मिलने या दर्शन करने के लिए कोई फीस लगती है?

बिल्कुल नहीं। पूज्य प्रेमानंद जी महाराज के दर्शन या आश्रम में जाने के लिए एक भी रुपया नहीं लगता। महाराज जी व्यक्तिगत दान, चढ़ावा या नकदी कभी स्वीकार नहीं करते। उनके दर्शन सभी के लिए पूरी तरह निशुल्क हैं।

4. प्रेमानंद जी महाराज किस संप्रदाय से जुड़े हैं?

महाराज जी ‘राधावल्लभ संप्रदाय’ से जुड़े हैं। उन्होंने पूज्य श्री मोहित मराल गोस्वामी जी से दीक्षा प्राप्त की थी। यह संप्रदाय श्री हित हरिवंश महाप्रभु द्वारा स्थापित किया गया था, जिसमें श्री राधा रानी को ही सर्वोपरि मानकर उनकी प्रेममयी निष्काम भक्ति की जाती है।

5. राधा नाम का जप कैसे करना चाहिए?

महाराज जी के अनुसार राधा नाम जप के लिए किसी विशेष स्थान, समय या विधि के बंधन की आवश्यकता नहीं है। आप काम करते हुए, चलते-फिरते, यात्रा में या खाली समय में मन ही मन या जिह्वा से “राधा-राधा” का उच्चारण कर सकते हैं। भाव यह होना चाहिए कि हे राधा रानी, मैं आपका हूं और आप मेरी हैं।

निष्कर्ष: कलियुग में एक जलता हुआ दिव्य दीपक

पूज्य श्री प्रेमानंद जी महाराज केवल एक कथावाचक या वक्ता नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसे जीवंत संत हैं जिन्होंने अपने जीवन के हर एक पल को त्याग, तपस्या और प्रेम की कसौटी पर कसकर दिखाया है। जब एक इंसान दोनों किडनियां खराब होने के बावजूद चेहरे पर मुस्कान लिए रात-दिन भगवान के नाम का उद्घोष कर सकता है, तो हम अपने छोटे-मोटे तनावों से क्यों हार मान लेते हैं?

महाराज जी का जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि आपका विश्वास ईश्वर में अटूट है और आपका चरित्र पवित्र है, तो दुनिया की कोई भी ताकत आपको तोड़ नहीं सकती। आइए, हम भी उनके अनमोल वचनों को अपने जीवन में उतारें, अपने माता-पिता का सम्मान करें, चरित्र की रक्षा करें और अपने होठों पर हमेशा उस पावन नाम को सजाए रखें — “श्री राधा, श्री राधा, श्री राधा”।

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